COPYRIGHT © Rajiv Mani, Journalist, Patna

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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

HAPPY NEW YEAR


सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार अनिल साह का निधन

 न्यूज@ई-मेल 
पटना : सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक व पत्रकार अनिल साह नहीं रहे। पिछले दिनों हृदय गति रूक जाने से उनका निधन हो गया। वे 72 साल के थे। आप लोकनायक जयप्रकाश नारायण के निकटतम सहयोगी थे। आप कुर्जी होली फैमिली हाॅस्पीटल के क्रेडिट मैनेजर थे और बाद में जयप्रभा हाॅस्पीटल के प्रशासक बने। कुर्जी पल्ली परिषद के माननीय सदस्य, कैथोलिक एसोसिएशन के माननीय सदस्य, कोलकाता से प्रकाशित विकली हेराल्ड के रिर्पोटर, ‘सार’ न्यूज एजेंसी के अधिकृत रिपोर्टर व ‘पवित्र हृदय का संदेश’ के लेखक थे। 
अनिल साह के पुत्र सिसिल साह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अल्पसंख्यक विभाग के उपाध्यक्ष हैं। पत्नी स्टेला साह हार्टमन स्कूल की पूर्व शिक्षिका हैं। साथ ही, छोटा बेटा राजन साह और बेटियां हैं। अनिल साह के निधन की खबर पाकर कुर्जी होली फैमिली हाॅस्पीटल की पूर्व प्रशासिका सिस्टर ग्रेस, सामुदायिक स्वास्थ्य एवं ग्रामीण विकास केन्द्र की पूर्व प्रभारी सिस्टर आन डिसूजा, सिस्टर बेर्नाडेक्ट, सिस्टर रोज आदि ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी। बाद मंे प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में 24 दिसम्बर की सुबह मिस्सा के बाद कुर्जी कब्रिस्तान में उन्हें दफन कर दिया गया। 
इस अवसर पर फादर अरुण अब्राहम, फादर सुशील साह, फादर सेराफिम जौन, फादर जौर्ज हिलारियन, फादर मैथ्यू चैम्पलानी, फादर अब्राहम पुतुमुना, फादर एंड्रू, फादर जाॅनसन केलकत, फादर केसी फिलिप, फादर फिलिप, फादर स्कारिया, फादर सेवास्टियन आदि येसु समाजी पुरोहितों ने मिस्सा किया। मुख्य अनुष्ठानकर्ता फादर अरुण अब्राहम थे। जो अनिल साह के पड़ोसी भी हैं।

फादर दीपक का निधन

पटना : फादर दीपका का निधन पिछले दिनों 13 दिसंबर को परमानंदा हॉस्पीटल, दिल्ली में हो गया। वे 61 साल के थे। उन्हें पटना में ही हाॅर्ट अटैक हुआ था। हाॅर्ट अटैक के बाद उन्हें पटना स्थित कुर्जी होली फैमिली अस्पताल सहित अन्य कई अस्पतालों में ले जाया गया, लेकिन पूर्ण रूप से ठीक ना हो पाने के कारण उन्हें दिल्ली ले जाना पड़ा, जहां डाॅक्टर उन्हें बचा नहीं सकें। 
फादर दीपक का होम पैरिश संत जोसेफ चर्च, मीरा रोड, मुम्बई है। इनका जन्म 12 सितंबर, 1954 को हुआ था। येसु समाज में 2 जनवरी, 1975 को प्रवेश किए। इनका पुरोहिताभिषेक 26 अप्रैल, 1986 को हुआ। येसु समाज की अंतिम प्रतिज्ञा 23 अप्रैल, 1995 को लिये। ईश्वर के राज में 13 दिसंबर, 2015 को चले गए। जीवन के 61 वसंत देख चुके फादर दीपक ने 39 साल की आयु में येसु समाजी के रूप में शिक्षा ली और अपना जीवन पल्ली स्तर की सेवा में लगाए। पुरोहिताभिषेक के एक साल के आनंद के बाद फादर दीपक पहली बार छात्रावास अधीक्षक के रूप में केआर हाई स्कूल, बेतिया में 1987-1989 तक रहे। संत जेवियर, पटना के उप प्राचार्य 1989-1991 तक रहे। केलीब्स हॉस्टल के सुपीरियर के रूप में सेंट जोसेफ कॉलेज त्रिची में 1992 से 1994 तक रहे। पल्ली पुरोहित व प्रधानाध्यापक, चुहड़ी में 1994-1998 तक रहे। कोषाध्यक्ष, बेतिया धर्मप्रांत में 1998-2000 तक रहे। प्रधानाध्यापक, मिशन मध्य विद्यालय, बेतिया में 2000-06 तक, सुपीरियर व प्रधानाध्यापक, राज राजेश्वर हाई स्कूल, बरबीघा में 2006-09 तक, स्टाफ जुनियरेट के रूप में एक्सटीटीआई, पटना में 2010 तक और पल्ली पुरोहित के रूप में फुलवारीशरीफ में 2010 से मृत्यु दिवस तक रहे।
निधन के बाद फादर दीपक को पटना के दीघा स्थित एक्सटीटीआई कब्र में दफना दिया गया। यहीं येसु समाज के मृतक सदस्यों को दफनाया जाता है। इसके पूर्व पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विलियम डिसूजा के नेतृत्व में धार्मिक अनुष्ठान किया गया। मुजफ्फरपुर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष काॅजिटेन फ्रांसिस ओस्ता, येसु समाजी, बक्सर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष सेवास्टियन कल्लूपुरा, येसु समाजी, पटना जेसुइट के सुपेरियर फादर जोस और दिल्ली जेसुइट के प्रतिनिधि फादर टोम तथा येसु समाजी के साथ दर्जनों पुरोहित इस अवसर पर उपस्थित थे। 

सिस्टर अल्फंसा का निधन

पटना : सिस्टर अल्फंसा का निधन पिछले दिनों हो गया। सिस्टर अल्फंसा कुर्जी-बालूपर स्थित सिस्टर्स आॅफ सेक्रेट हार्ट की सिस्टर थी। ज्ञात हो कि यह धर्मप्रांतीय स्तर का काॅन्वेंट है। पटना धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष लुइस वान हुइक, येसु समाजी इसके संस्थापक हैं। बेतिया में 1929 में सिस्टर्स आॅफ सेक्रेट हार्ट के गठन के बाद इसका विस्तार यहां किया गया था। सिस्टर अल्फंसा केरल से बिहार आकर सेवा कार्य कर रही थी। सिस्टर अल्फंसा का अंतिम संस्कार कुर्जी स्थित कब्रिस्तान में कर दिया गया। इसके पूर्व पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विलियम डिसूजा के नेतृत्व में धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया। साथ ही मुजफ्फरपुर के धर्माध्यक्ष काजिटेन फ्रांसिस ओस्ता सहित कई पुरोहित भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

एनटीपीसी कर्मी की पत्नी का निधन

पटना : बाढ़ में कार्यरत एनटीपीसी कर्मी क्लारेंस लौरेंस की पत्नी शीला लौरेंस का पिछले दिनों निधन हो गया। उनका हार्ट अटैक हुआ था। पश्चिमी पटना स्थित शिवाजी नगर स्थित उनके मकान से अस्पताल ले जाते समय राह में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। वह 50 साल की थीं। शीला लौरेंस के दो लड़के और एक लड़की हैं। कुर्जी पल्ली की कब्रिस्तान में इन्हें दफनाया गया है।

आलोक कुमार की खबरें

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

किसी को अपनों ने मारा, किसी को महंगाई ने

  • दीघा रेलवे लाइन के किनारे सरकारी जमीन पर बसायी बस्ती
  • अधिकांश हैं रविदास और मुसहर समुदाय से
  • सरकारी सुविधाओं से हैं वंचित
 खास खबर 
राजीव मणि
पटना : पश्चिमी पटना स्थित दीघा रेलवे लाइन के किनारे दलितों की एक बस्ती है। यह बस्ती विस्तार पाकर बड़ी होती जा रही है। पहले यहां कुछेक झोपडि़यां ही थीं। अब कई नयी झोपडि़यां और बन गयीं। यहां रहने वाले कुछ तो अपनों के ठुकराये हैं। दूसरी तरफ ज्यादातर बढ़ती महंगाई से तंग आकर यहां झोपड़ी बनाने को मजबूर हैं। अधिकांश का कहना है कि इन्हें कभी कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह अपने परिवार का खर्च चला रहे हैं। 
यहीं चालीस वर्षीय विजय दास अपनी पत्नी लालती (35) और चार छोटे-छोटे बच्चों के साथ रहते हैं। विजय प्राइवेट गाड़ी चलाकर हर माह तीन-चार हजार रुपए कमा लेते हैं। लालती घरों में दाई का काम करती है। वह भी हर माह करीब तीन हजार रुपए कमा लेती है। किसी तरह इनके घर का खर्च चल पाता है। लालती बताती है कि पहले वह पास के ही मुहल्ले में किराये पर रहती थी। लेकिन, महंगाई बढ़ जाने पर जब घर का खर्च चलाना मुश्किल हुआ, तो वह यहां झोपड़ी बनाकर रहने लगी। वह कहती है कि आजतक कभी कोई सरकारी मदद नहीं मिली। 
वहीं देव सहाय उर्फ सिपाही जी (67) अपनी पत्नी शारदा देवी (65) के साथ यहां झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं। इनके बेटों ने इन्हें अपने साथ रखने से मना कर दिया। सिपाही जी बताते हैं कि वह पहले दीघा स्थित जूट मिल में काम करते थे। 1976 तक वहां काम किया। इसके बाद 1978 में दीघा क्षेत्र में ही किराये के मकान मेें पत्नी-बच्चों सहित रहने लगे। जब बच्चे बड़ा हुए तो उन्होंने सिपाही जी और उनकी पत्नी को घर से बाहर कर दिया। अंततः उन्हें यहां झोपड़ी बनानी पड़ी। सिपाही जी और उनकी पत्नी को वृद्धा पेंशन मिलता है। 
यहीं शिवनाथ चौधरी (40) मिलें। राजमिस्त्री का काम करते हैं। यह भी अपनी पत्नी धर्मशीला देवी (38) और बच्चों के साथ यहां रहते हैं। शिवनाथ कहते हैं कि हर दिन काम नहीं मिलने से आर्थिक तंगी बनी रहती है। धर्मशीला भी दाई का काम करती है। दाई का काम कर वह हर माह दो हजार रुपए कमा लेती है। 
इसी तरह के कई और परिवार यहां रह रहे हैं। सभी मजदूरी करते हैं। साथ ही, अधिकांश औरतें भी कुछ ना कुछ काम कर अपने पति का आर्थिक रूप से मदद करती हैं। यहां असुरक्षित झोपडि़यों में रहते हुए इन्हें असामाजिक तत्वों के साथ चोरों से भी सामना करना पड़ता है। चोरी की घटनाएं यहां आम हैं। इन सभी दलितों की मांग है कि सरकार इनके रहने की समुचित व्यवस्था करे। साथ ही राशन-किरासन भी दिये जाने की मांग ये सरकार से कर रहे हैं।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

एक बस्ती, तीस घर, दस विधवाएं

 संक्षिप्त खबर 
पश्चिमी पटना में एक मुहल्ला है एलसीटी घाट। यहीं गंगा किनारे मुसहरों की एक बस्ती है। नाम है एलसीटी घाट मुसहरी। इस मुसहरी में करीब तीस घर हैं। और इन तीस घरों की बस्ती में दस विधवाएं ! सबकी उम्र 45 साल से कम। सभी अपने-अपने पति की मनमानी की सजा विधवा के रूप में भुगत रही हैं। सभी को शराब की लत थी। पत्नियां काफी समझाती थीं। इसके बावजूद उनकी बात वे नहीं माने। बात मानने की बात तो दूर, वे मारपीट करने लगते थे। परिणाम यह हुआ कि शराब के कारण अधिकांश क्षयरोग के शिकार हो गये। साथ ही, कालाजार व किडनी की समस्या भी। और इन्हीं रोगों से वे एक-एक कर चल बसे। 
कलासो देवी (45), गीता (30), सुशीला (40), शान्ति देवी (45), शारदा (35), तारामुनि (35) के अलावा चार अन्य महिलाएं आज विधवा हैं। सभी के छोटे-छोटे बच्चे हैं। कचरा के ढेर से कागज, लोहा, प्लास्टिक आदि चुनकर किसी तरह गुजारा चलता है। इनके पास ना लाल कार्ड है, ना पीला। विधवा पेंशन भी नहीं मिलता है। ज्ञात हो कि यह क्षेत्र उत्तरी मैनपुरा पंचायत में पड़ता है। कभी इंदिरा आवास योजना अंतर्गत इनके मकान बने थे। आज ढह रहे हैं। अब इन्हें किसी तरह की सरकारी या गैर सरकारी सहायता नहीं मिल पा रही है। भगवान भरोसे जी रहे हैं सभी। 
इस संबंध में उत्तरी मैनपुरा पंचायत के मुखिया सुधीर सिंह से बात की गई। उन्होंने बताया कि जिन महिलाओं ने आवेदन जमा कर रखा है, उनका काम जल्द ही हो जायेगा। दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव के कारण विधवा पेंशन सहित अन्य मामला अटका पड़ा था।  

डाॅक्टर ने बनाया अंधा 

दस वर्षीया सुमन जन्मजात अंधी नहीं है। एक नर्सिंग होम के डाॅक्टरों ने उसे अंधी बना दिया। जी हां, यही कहना है सुमन की माता रीता देवी का। वह बताती है कि बचपन में एकबार सुमन बीमार पड़ी थी। उसे तेज बुखार के साथ उल्टी हो रही थी। सुमन को पटना के बोरिंग रोड चैराहा स्थित एक नर्सिंग होम में ले जाया गया। वहां इलाज के दौरान उसके आंख की रौशनी खत्म हो गयी। सुमन को कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। तब सुमन मात्र चार साल की थी। सुमन एलसीटी घाट मुसहरी में रहती है। इसके पिता अर्जुन मांझी मजदूरी करते हैं। मां रीता देवी कचरा से कागज, प्लास्टिक, लोहा आदि चुनती है। 

बेटी चला रही सारा खर्च

जी हां, इसी एलसीटी घाट मुसहरी में एक बेटी ऐसी भी है, जो अपने मां-बाप सहित भाई-बहनों का सारा खर्च ना सिर्फ चला रही है, बल्कि घर बनवाने को अपने मां-बाप को पैसे भी दिये। इस बेटी का नाम है मनीषा। मनीषा मात्र 18 साल की है और महंथ स्कूल के पास होसिनी मियां के कबाड़ की दुकान पर काम करती है। छह हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर। मनीषा के पिता बालदेव मांझी मजदूर हैं। मां सूगापति देवी कचरा चुनने जाती है। बालदेव मांझी बताते हैं कि मनीषा हमेशा अपने घर में सहयोग करती है। अब उसकी शादी नदौल में ठीक हो गयी है। अगले साल वह शादी कर अपने घर चली जायेगी।

पर्यावरण सह पुस्तक प्रदर्शनी का समापन

दो दिवसीय पर्यावरण सह पुस्तक प्रदर्शनी का समापन पिछले दिनों हो गया। साईं-शिवम् पब्लिक स्कूल एवं शिवम् क्लाशेज की ओर से इस प्रदर्शनी का आयोजन पटना के बोरिंग रोड में किया गया था। सड़क किनारे लगी इस प्रदर्शनी की खास बात यह रही कि इसमें 30 रुपए की कोई भी किताब खरीदने पर एक पौधा बिल्कुल फ्री दिया गया। प्रदर्शनी का संचालन कर रहे एवं लालजी साहित्य प्रकाशन के लालजी सिंह ने बताया कि इस तरह की प्रदर्शनी का मकसद लोगों को साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति भी जागरूक करना है।
 और अंत में 

कैसे-कैसे बाबा !

एक बाबा हैं। उन्होंने अपना नाम रखा है भगवान ललन जी। जी हां, खुद को वे भगवान ही बताते हैं। एकबार वे कहीं से पता करते मेरे घर अपनी खबर छपवाने पहुंच गये। उन्होंने मुझे ‘‘भगवान ललन जी दर्शन होंगे’’ नामक एक परची भी दी। उस परची में यह दावा किया गया है कि ललन जी भूकंप को रोक सकते हैं। नेपाल में आये प्रलयंकारी भूकंप की तीव्रता को उन्होंने ही अपने तप से कम किया था। परची के माध्यम से वे दावा करते हैं कि संसार में झूठ, छल, अधर्म तथा पाप के बढ़ने के कारण ही इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। अतः मनुष्य को झूठ, छल, अधर्म तथा पाप का त्याग करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि प्रलय तीन प्रकार के होते हैं - पल में प्रलय, जल प्रलय और भूकंप।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है विवाह

भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूर्णताएं दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। 
विवाह का स्वरूप आज वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नि का चुनाव शारीरिक आकषर्ण को ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पत्नि पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा। समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूर्वकाल की तरह बने रहने देना चाहिए।
 विवाह के प्रकार 
ब्रह्म विवाह : दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
दैव विवाह : किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
आर्श विवाह : कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य देकर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है।
प्रजापत्य विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
गंधर्व विवाह : परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।
असुर विवाह : कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
राक्षस विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।
पैशाच विवाह : कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।
साभार: विकिपीडिया

ईसाइयों ने पवित्र युख्रीस्तीय यात्रा निकाला











सोमवार, 9 नवंबर 2015

HAPPY DIWALI


15 वर्ष की आयु से पहले सेक्‍स करना चाहती हैं लड़कियां

 वेबसाइट से 
दिल्‍ली : भारत देश विकास की मार्ग पर तेजी से बढ़ रहा है। आज लड़कियां हर वो काम कर रही हैं जो लड़के करते थे। ऐसे में सेक्‍स क्‍यों पीछे रहे। इस मामले में भी लड़कियों ने लड़कों को पीछे छोड़ दिया है। जी हां 15 से 19 वर्ष की लड़कियां सेक्‍स के मामले में लड़कों से कहीं आगे हैं। 
वर्ष 2005 से 2010 के बीच भारत में 3 फीसदी लड़कों ने जहां 25 साल की उम्र में सेक्‍स कर चुके हैं वहीं लगभग 8 फीसदी लड़कियां इसी उम्र में सेक्‍स कर चुकी हैं। यह हम नहीं बल्कि यूनिसेफ की रिपोर्ट कह रही है। यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित किशोरों पर ग्‍लोबल रिपोर्ट कार्ड 2012 में यह खुलासा किया गया है कि चीन को छोड़कर अन्‍य विकासशील देशों में किशोरावस्‍था में 5 फीसदी लड़कों के तुलना में 11 फीसदी लड़कियां 15 वर्ष की उम्र से पहले सेक्‍स कर चुकी होती हैं। रिपोर्ट की मानें तो प्रसव और एचआईवी संक्रमण के खतरे में वृद्धि भी इसी कारण से हुई है। 
गौरतलब है कि भारत में 35 फीसदी किशोरों और 19 फीसदी लड़कियों को ही एड्स के बारे में पूरी तरह से जानकारी है जो कि बहुत कम है। 2010 के आंकडों की मानें तो भारत में 49 हजार किशोर और 46 हजार किशोरियां एचआईवी से संक्रमित हैं। पूरी दुनिया पर नजर डालें तो 10 से 19 वर्ष के लगभग 22 लाख युवा एचआईवी के साथ जी रहे हैं। जिसमें से 13 लाख और 8,70,000 किशोर लड़के-लड़कियों को अपनी वर्तमान स्थि‌ति के बारे में भी अंदाजा नहीं है।

एग्‍जाम में नकल कराने के बदले स्‍टूडेंट से शारीरिक संबंध बनाती थी महिला टीचर

गुड़गांव : साइबर सिटी गुड़गाव में एक ऐसी वारदात सामने आई है जिसने गुरु और शिष्‍य के पवित्र रिश्‍ते को कलंकित कर दिया है। यहां एक स्‍कूल में महिला टीचर अपनी हवस की आग में इस कदर अंधी हो गई कि उसने अपने ही स्‍टूडेंट को शिकार बना लिया। जी हां यह टीचर हाईस्‍कूल में पढ़ने वाले अपने स्‍टूडेंट से एग्‍जाम में नकल कराने के बदले शारीरिक संबंध बनाती थी। मामले का खुलासा होने के बाद मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और छानबीन हो रही है।
जानकारी के मुताबिक, मानेसर के एक निजी स्कूल में पढऩे वाले 17 वर्ष के स्टूडेंट पर उसकी क्लास में पढ़ाने वाली एक महिला टीचर की बुरी नजर थी। वो अपने स्‍टूडेंट से शारीरिक संबंध बनाना चाहती थी। उसने एग्‍जाम के समय उस स्‍टूडेंट को खूब नकल कराया। धीरे-धीरे एग्‍जाम में पास होने के लिए स्‍टूडेंट पूरी तरह से टीचर पर निर्भर हो गया। बस इसी का फायदा उठाकर टीचर उसे ब्‍लैकमेल करने लगी और शारीरिक संबंध बनाने लगी। स्‍टूडेंट टीचर की गिरफ्त में बुरी तरह फंस गया था। स्‍कूल के बाद टीचर अकसर उसे बाहर मिलने को बुलाती थी और फिर अपनी हवस मिटाती थी। एक दिन तंग आकर उसने अपने परिजनों को सब सच बता दिया। पूरा परिवार इसे सुनकर हैरान रह गया। स्टूडेंट के परिवार ने मानेसर थाने में आरोपी महिला टीचर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और स्कूल के प्रिसिंपल को भी इसकी सूचना दी। टीचर के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत यौन उत्पीड़ऩ का केस दर्ज किया गया है।

साइबर कैफे में पत्‍नी की ब्‍लू फिल्‍म देख पति के उड़े होश

दिल्ली : कम हो या ज्यादा हॉट वीडियो देखने का शौक सबके अन्दर होता है कोई इसे खुल के देखता है तो कोई चोरी छुपे लेकिन एक ऐसी खबर है जिसको सुन कर आप दंग रह जाएंगे। मामला राजधानी दिल्ली का है जहाँ एक अश्लील वीडियो के चक्कर में एक हंसता खेलता घर उजड़ने की कगार पर है। आपको बता दें की वीडियो के चक्कर में पति पत्नी के मधुर रिश्ते में दरार आ गयी है। 
जानकारी के मुताबिक दिल्ली में रहने वाले रामधन को अश्लील वीडियो देखने का शौक था। इंटरनेट का जानकार रामधन अपने इस शौक को पूरा करने के लिए साइबर कैफे की मदद लेता था। हर बार की तरह ही रामधन पोर्न वीडियो देखने साइबर कैफे गया। अभी वो नेट पर बैठा वीडियो सर्च कर ही रहा था कि अचानक उसकी नजर एक वीडियो पर पड़ी जिसमें उसकी बीवी एक अन्‍य पुरुष के साथ यौन संबंध स्‍थापित कर रही है। यह देख उसके होश उड़ा दिए और वो आश्चर्यचकित रह गया। रामधन ने जब घर आकर इस मामले कि जांच पड़ताल शुरू कि जहाँ उसने अपनी पत्नी पर सवालों की झड़ी लगा दी। सवालों का सामना मजबूती से करते हुए रामधन की पत्नी ने जो उसको बताया उसके बाद रामधन का बुरा हाल हो गया। रामधन की पत्नी ने बताया की उसने एक, दो नही बल्कि 11 पॉर्न फिल्में बनाई है। वह अपने पूर्व बॉयफ्रेंड के साथ ऐसी फिल्मे बनाती थी।

एक गांव ऐसा जहां बाप कहे बेटी से सेक्स करो

बेंगलुरू : हम जिस देश में रहते हैं वहां की संस्कृति और समाज सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं करती हैं और जो इंसान इसपर खुलकर बोलता है उसे ही बेशर्म की संज्ञा दे दी जाती है। खासकर हमारे देश में माता-पिता भी इस बारे में बच्चों से कभी कोई बात करना पसंद नहीं करते हैं और ना चाहते हैं कि इस तरह की बातें उनके बच्चे उनसे इस विषय पर कुछ पूछे। भारत ही नहीं विश्व के कई देश शादी से पहले के शारीरिक संबंधों को सही नहीं मानते हैं। लेकिन आपको सुनकर हैरत होगी कि विश्व में एक देश ऐसा भी है जहां पर लड़की का पिता ही उससे कहता है कि वो जाकर लड़को से मिले और जो अच्छा लगे उसके साथ रिलेशन बना लें। 
जी हां कंबोडिया के आदिवासी समुदाय में यह एक प्रथा है जहां के लोग धड़ल्ले से इसका पालन करते हैं। प्रथा के मुताबिक जैसे ही किसी बाप की बेटी को मासिक धर्म आना शुरू हो जाता है तो उसे जवान मान लिया जाता है, उसके बाद बाप अपनी बेटी के लिए एक झोपड़ी तैयार करता है जिसे लवहट कहा जाता है, जिसमें वो कहता है कि उसकी लड़की आदिवासी समुदाय के लड़को से मिले और जरूरत पड़ने पर संबंध बना ले। उसके बाद लड़की को जो भी लड़का सही लगता है उसके साथ उसकी शादी कर दी जाती है। इस तरह से एक बाप अपनी ही बेटी को कहता है कि वो एक से ज्यादा लड़को के साथ रिलेशन बनाये। 
हालांकि बदलते वक्त ने आदिवासियों की सोच में परिवर्तन तो किया है जिसके चलते लड़कियां रिलेशन बनाने से पहले कंडोम का प्रयोग करने लगी हैं। लेकिन समुदायके लोग इस प्रथा को नहीं बदलने वाले हैं। ऐसे में अगर कोई लड़की गर्भवती हो जाये लेकिन जिस लड़के के चलते वो गर्भधारण करती हैं उसे वो पसंद न करके किसी दूसरे लड़के को पसंद करती है तो दूसरे लड़के को लड़की से शादी करके बच्चे को अपना नाम देना पड़ता है।

पकड़ा गया जिस्‍मफरोशी का बड़ा रैकेट, मेडिकल स्‍टूडेंट्स करती थी धंधा

त्रिपुरा : त्रिपुरा में पुलिस ने एक बड़े सेक्‍स रैकेट का खुलासा करते हुए 34 लोगों को गिरफ्तार किया है। आप जानकर दंग रह जाएंगे कि गिरफ्तार लड़कियों में दो लड़कियां मेडिकल कॉलेज में पढ़ती हैं और कुछ लड़कियों की उम्र महज 17 साल है। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने सभी को कोर्ट में पेश करने के बाद न्‍यायिक हिरासत में भेज दिया है।
जानकारी के मुताबिक पुलिस को मुखबिर ने सूचना दी थी कि अगरतला में तीन ऐसे रेस्‍त्रां हैं जहां जिस्‍मफरोशी का धंधा होता है। पुलिस ने फौरन कार्रवाई करते हुए तीनों रेस्‍त्रां पर छापा मारा और 20 लड़के-लड़कियों सहित 34 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस से प्राप्‍त जानकारी के मुताबिक गिरफ्तार लोगों में दो युवतियां अगरतला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और अगरतला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज की छात्रा हैं। एक युवती नर्सिग इंस्टीट्यूट की छात्रा है और दो लड़कियों की उम्र 17 साल है।

2 बेटियों सहित जिस्‍म का सौदा करते भाजपा की महिला नेता गिरफ्तार

देहरादून : उत्‍तराखंड में पुलिस ने जिस्‍मफरोशी के बड़े रैकेट का खुलासा करते हुए संचालिका और पांच लड़कियों को गिरफ्तार किया है। इस हाईफाई सेक्‍स रैकेट को भारतीय जनता पार्टी की एक नेत्री संचालित कर रही थी। रैकेट संचालिका ऊधमसिंह नगर की भाजपा अल्‍पसंख्‍यक मोर्चा की जिला महामंत्री है। हैरान करने वाली बात ये है कि जिन कॉलगर्ल्‍स को गिरफ्तार किया गया है उसमें भाजपा नेत्री की दो बेटियां भी शामिल हैं। पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में कैश और आपत्तिजनक सामान बरामद किया है।
जानकारी के मुताबिक पुलिस को उसके मुखबिर से सेक्‍स रैकेट चलाए जाने की सूचना मिली। सूचना पाकर पुलिस ने फर्जी ग्राहक बनकर रैकेट की संचालिका से बात कर पांच युवतियों की मांग की। जिसके बाद रैकेट की संचालिका ने 70 हजार रूपए में डील तय की। गुरूवार को रैकेट संचालिका ने 25 हजार रूपए बैंक अकाउंट में जमा कराने के लिए कहा, जिसके बाद अकाउंट में 25 हजार रूपए जमा कराए गए। पैसा जमा करने के बाद सौदा तय हो गया और 31 अक्‍टूबर को लड़कियों के भेजने की बात फिक्‍स हो गई। लड़कियां फर्जी ग्राहक (पुलिस) से मिलने आईं और उसके कार में बैठकर जाने लगीं तभी पुलिस ने कार को घेर लिया। पुलिस सभी को थाने लेकर आई और कॉलगर्ल्‍स के पास से कैश और आपत्तिजनक सामान बरामद किया गया। पुलिस का कहना है कि इस बारे में पुलिस को दो महीने पहले जानकारी मिली थी। जिन्हें एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग सेल ने जाल बिछाकर उन्हें पकड़ने का प्लान बनाया। पुलिस का कहना है कि भाजपा नेत्री अपनी दो बेटियों के साथ मिलकर यह अवैध धंधा चला रही थी।
साभार : वन इंडिया

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2015

अछूत की शिकायत

 दो दलित कविताएं 
हीरा डोम
हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के साहेब से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुख भगवानओं न देखता ते,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।
पदरी सहेब के कचहरी में जाइबिजां,
बेधरम होके रंगरेज बानि जाइबिजां,
हाय राम! धसरम न छोड़त बनत बा जे,
बे-धरम होके कैसे मुंहवा दिखइबि॥१॥
खंभवा के फारी पहलाद के बंचवले।
ग्राह के मुँह से गजराज के बचवले।
धोती जुरजोधना कै भइया छोरत रहै,
परगट होके तहां कपड़ा बढ़वले।
मरले रवनवाँ कै पलले भभिखना के,
कानी उँगुरी पै धैके पथरा उठले।
कहंवा सुतल बाटे सुनत न बाटे अब।
डोम तानि हमनी क छुए से डेराले॥२॥
हमनी के राति दिन मेहत करीजां,
दुइगो रूपयावा दरमहा में पाइबि।
ठाकुरे के सुखसेत घर में सुलत बानीं,
हमनी के जोति-जोति खेतिया कमाइबि।
हकिमे के लसकरि उतरल बानीं।
जेत उहओं बेगारीया में पकरल जाइबि।
मुँह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानीं,
ई कुल खबरी सरकार के सुनाइबि॥३॥
बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,
ठकुर क लेखे नहिं लउरि चलाइबि।
सहुआ के लेखे नहि डांड़ी हम जोरबजां,
अहिरा के लेखे न कबित्त हम जोरजां,
पबड़ी न बनि के कचहरी में जाइबि॥४॥
अपने पहसनवा कै पइसा कमादबजां,
घर भर मिलि जुलि बांटि-चोंटि खदबि।
हड़वा मसुदया कै देहियां बभनओं कै बानीं,
ओकरा कै घरे पुजवा होखत बाजे,
ओकरै इलकवा भदलैं जिजमानी।
सगरै इलकवा भइलैं जिजमानी।
हमनी क इनरा के निगिचे न जाइलेजां,
पांके से पिटि-पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलैं,
हमने के एतनी काही के हलकानी॥५॥
यह कविता महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ (सितंबर 1914, भाग 15, खंड 2, पृष्ठ संख्या 
512-513) में प्रकाशित हुई थी।


मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

अदम गोंडवी
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!
साभार: कविता कोश

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

एक नेता का कबूलनामा

 मजाक डाॅट काॅम 
राजीव मणि 
चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। सीट बंटवारे की पहली लिस्ट पार्टी जारी कर चुकी थी। कई नेताओं के नाम इस लिस्ट में नहीं थे। सभी असंतुष्ट नेता पार्टी कार्यालय में आकर हंगामा मचा रहे थे। कुछ नेता ‘पार्टी अध्यक्ष मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, तो कुछ गमला-मेज-कुरसी पटक रहे थे। लोटन दास अपनी धोती खोलकर प्रवेश द्वार पर बिछा धरने पर बैठ गये। अन्य नेताओं से चिल्लाकर बोले, ‘‘भाइयों, आप भी इस मनमानी के खिलाफ हमारा साथ दें। पैसे देकर खरीदे गये हैं टिकट ! इसके खिलाफ हम यहां नंग-धड़ंग धरना देंगे, प्रदर्शन करेंगे।’’ 
लोटन दास की बात सुनकर कुछ और नेता वहां आ गये। सभी धोती-कुरता खोलने लगे। भीड़ में से आवाज आयी, ‘‘नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, सौदेबाजी नहीं चलेगी।’’ 
कुछ ही देर में मीडियाकर्मी वहां पहुंच गये। दर्जनों कैमरा देख नेताओं में और जोश आ गया। कुछ तो अपनी चड्डी उतारने लगे, लेकिन बगलवाले ने ऐसा करने से रोका। फुसफुसाकर नेता को बताया, ‘‘चैनल पर लाइव आ रहा है।’’ 
दूसरी तरफ शनिचर महतो मैदान में लोट रहे थे। चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, ‘‘एक बीघा जमीन बेचकर पैसे दिये थे। मेरी तीनों पत्नियां मना कर रही थीं। बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटी एक कार्यकर्ता के साथ भाग गयी। फिर भी मैं टिकट के लिए रात-दिन लगा रहा। पैसे लेकर भी मुझे टिकट नहीं दिया गया। अब मैं कौन-सा मुंह लेकर घर जाऊं।’’ इतना बोलते ही शनिचर की हालत खराब हो गयी। ... और फिर, हृदयगति रुक जाने से उनकी मौत हो गयी। 
इसपर पार्टी कार्यालय में जमकर हंगामा मचा। भारी संख्या में पुलिस आ गयी। डंडे चले। टीवी पर लाइव चलता रहा। और देखते ही देखते यमराज को शनिचर महतो की मौत की खबर मिल गयी। पलक झपकते यमराज वहां पहुंच गये और अपने भैसा पर शनिचर महतो की आत्मा को जबरन बैठा चलते बने। 
यमराज ने चित्रगुप्त के दरबार में लाकर शनिचर को पटक दिया। चित्रगुप्त ने इशारे से पूछा, ‘‘कौन है यह ?’’ 
‘‘महाराज, अभी-अभी मरा है। नाम शनिचर महतो है। खुद को वहां नेता बताता था। चुनाव में टिकट नहीं मिलने का दर्द बर्दाश्त नहीं कर सका। हृदयगति रुक जाने से इसकी मृत्यु हो गयी।’’ यम ने हाथ जोड़कर कहा। 
‘‘ठीक है, शनिचर, तुम कठघरे में आ जाओ। तुम्हारे पाप-पुण्य का हिसाब-किताब हो जाने पर ही यह निर्णय लिया जाएगा कि तुम्हें स्वर्ग भेजना है या नरक।’’ चित्रगुप्त ने कड़ककर कहा। 
शनिचर महतो दुखी मन से कठघरे में आ गये। उनसे कुछ पूछा जाता, इससे पहले ही बोल पड़े, ‘‘महाराज, या तो हमें स्वर्ग भेजिए या फिर से धरती पर। हम जिन्दगी भर जनता की सेवा किये हैं। हमें यह मौका मिलना ही चाहिए ...।’’ 
बीच में ही चित्रगुप्त महाराज बोल उठे, ‘‘कमबख्त, दुष्ट, इसे भी क्या तुम धरती समझते हो ? जब कुछ पूछा जाए तो बोलना।’’ फिर कुछ फाइल निकालकर चित्रगुप्त देखने लगे। कुछ देर बाद नाराज होते हुए तेज आवाज में बोले, ‘‘दुष्ट, तुम पर पहला आरोप यही है कि तुमने अबतक जनता को लूटा है।’’ 
‘‘नहीं महाराज, यह गलत है, बल्कि लूटा तो मैं गया हूं। सारे खेत बेचकर टिकट के लिए पैसे दिये थे, टिकट भी नहीं मिला ! और इसी गम में मुझे अपने प्राण गंवाने पड़े।’’ शनिचर ने विनम्र भाव से कहा। 
‘‘तुमने अपने स्वार्थ में खेत बेचकर टिकट पाने के लिए पैसे दिये थे। इसमें जनता का क्या भला ? पापी, तुमने यह भी नहीं सोचा कि तुम्हारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ?’’ चित्रगुप्त नाराज हुए। 
‘‘क्षमा महाराज, मैं तो ...।’’ 
‘‘दुष्ट, तुमने आजतक जनता के लिए क्या किया ? अपनों के बीच ठेके बांटे, कमीशन के पैसों से जमीन-जायदाद बनाया। गरीब-असहायों की जमीन हड़प ली। मकान पर कब्जा जमाया। अबलाओं की इज्जत लूटी। बेशरम !’’ चित्रगुप्त क्रोधित हो गये। 
‘‘यह सब झूठ है महाराज, किसी ने गलत खबर दी है। पूरा इलाका जानता है कि ...।’’ 
चित्रगुप्त बीच में ही बोले, ‘‘क्या यह सच नहीं कि तुमने तीन शादियां की हैं ?’’ 
‘‘सच है महाराज।’’ 
‘‘क्या तुमने बलात्कार के आरोप से बचने के लिए दूसरी शादी नहीं की थी ?’’ 
शनिचर कुछ देर सिर झुकाए खड़ा रहा। फिर बोला, ‘‘की थी महाराज।’’ 
‘‘तो क्या तीसरी शादी के बारे में भी मुझे ही भेद खोलना पड़ेगा।’’ 
‘‘मैं अपना गुनाह कबूलता हूं महाराज।’’ 
चित्रगुप्त कुछ देर शनिचर महतो को देखते रहे, फिर कुछ सोचकर बोले, ‘‘शनिचर, तुम मान चुके हो कि तुम्हारे ऊपर लगाया गया पहला आरोप सही है। अब मैं तुम्हें दूसरा आरोप बताता हूं।’’ चित्रगुप्त कुछ क्षण शनिचर का चेहरा देखते रहे। वे कठघरे में खड़ा-खड़ा डर रहे थे, ना जाने चित्रगुप्त क्या आरोप लगा बैठे। मन में सोच रहे थे, आखिर चित्रगुप्त को यह सब जानकारी कहां से मिल गयी। धरती पर तो आजतक किसी ने इस तरह आरोप लगाने का साहस नहीं किया। तभी पूरे दरबार में कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तुमपर दूसरा आरोप है कि तुमने अपने जीवन में जमकर अय्यासी की। इसी अय्यासी के कारण अपने घर-परिवार को उपेक्षित रखा।’’ 
शनिचर अंदर तक कांप गये। जिस बात की आशंका थी, वही हुई। वे धीमी आवाज में बोले, ‘‘महाराज, अभी आपने जो जिक्र किया था, उसके अलावा कुछ नहीं किया।’’ 
शनिचर की बात सुनकर चित्रगुप्त फिर क्रोधीत हो गये, ‘‘नालायक, तुम क्या समझते हो, यह तुम्हारी धरती है, पार्टी कार्यालय है ? तुम क्या-क्या गुल खिलाकर यहां आये हो, मुझे पता नहीं ? अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो यह तुम्हारी भूल है। मैं सब जानता हूं। यहीं से सारा खेल देखा करता हूं। लेकिन, फैसला सुनाने से पहले मैं तुम्हारे ही मुंह से यह सब सुनना चाहता हूं। बाद में यह ना कहना कि मुझे सफाई का मौका नहीं दिया गया। यह चित्रगुप्त का दरबार है, और यहां सबको अपनी बात रखने का बराबर मौका दिया जाता है। इस दरबार के न्याय की चर्चा तीनों लोक, दसों दिशाओं में होती है। क्या तुम भूल रहे हो ?’’ 
‘‘क्षमा महाराज, क्षमा ! मैंने कुछ और युवतियों की इज्जत लूटी है। कभी रैली के बहाने राजधानी ले जाने पर, कभी काम करवाने का लालच देकर। लेकिन, मुझे ठीक-ठीक संख्या नहीं मालूम। स्मरण नहीं है महाराज।’’ 
चित्रगुप्त को अंदर से काफी गुस्सा आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि अपनी खड़ाऊं फेंककर ही शनिचर को मार बैठेंगे। लेकिन, उन्होंने संयम से काम लिया। सहज होते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी बेटी क्यों तुम्हारे ही कार्यकर्ता के साथ भाग गयी ?’’ 
‘‘मैं अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा सका, महाराज। मैं तो वरुण सोनार को भला आदमी समझता था। उसके लिए क्या नहीं किया। अधिकांश ठेके उसी को दिये। जब वह सामने आता था, हाथ जोड़े रहता था। उसके मुंह से तो कोई आवाज ही नहीं निकलती थी। मेरे कदमों में बैठा रहता था। मेरे एक इशारे पर घर-बाहर का सारा काम कर दिया करता था। उसकी बनावटी ईमानदारी ने मुझे धोखा दिया, महाराज। मुझे क्या मालूम था कि वह घर का काम करने के बदले कौन-सा काम कर रहा है।’’ इसके आगे शनिचर कुछ बोल ना सका। मुंह लटकाये खड़ा रहा। 
‘‘क्या तुम वरुण सोनार से हर ठेके में कमीशन नहीं खाते थे ?’’ 
‘‘खाता था महाराज।’’ 
‘‘तो फिर किस मुंह से कह रहे हो कि जनता के सेवक हो ?’’ 
‘‘हूं महाराज, मैंने जनता की काफी सेवा की है। गलियां, सड़कें, पुल, पुलिया, काफी कुछ बनवाया हूं।’’ शनिचर के चेहरे पर थोड़ी चमक दिखी। 
‘‘मुझे भी ठगने चला है शैतान।’’ चित्रगुुप्त डांटते हुए बोले, ‘‘क्या तुमने खुद कमाकर ये सारी चीजें बनवायी थीं ? जनता के पैसों से बनवाया, उसमें भी कमीशन खाकर हीरो बनता है। दुष्ट, अगर सेवा की भावना ही होती, तो टिकट ना मिलने पर अपनी जान क्यों देता। क्या जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ना जरूरी था ? तुम बिना चुनाव लड़े जनता की सेवा नहीं कर सकते थे, किसी ने मना किया था ?’’ 
‘‘नहीं महाराज, किसी ने मना नहीं किया था।’’ इससे ज्यादा शनिचर कुछ बोल ना सका। 
‘‘तो तुम मान रहे हो कि जनता को लूटने के लिए ही तुमने राजनीति की राह ली ?’’ 
शनिचर के मुंह से कुछ नहीं निकल सका। सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाकर रह गया। चित्रगुप्त ने राहत की सांस ली। रुककर बोले, ‘‘तुम्हारे ऊपर लगा यह आरोप भी सच साबित होता है। दरअसल तुम धरती के भार थे। तुम्हारे मरने से धरती पर एक पापी कम हो गया। अब बताओ, तुम्हारा पुत्र घर छोड़कर क्यों गया ?’’ 
‘‘उसे मेरा राजनीति में आना पसंद नहीं था, महाराज। वह हमेशा मुझे इससे दूर रहने की सलाह देता था। लेकिन, मैं उसकी बात ...।’’ इतना कहकर शनिचर चुप हो गया। 
‘‘देखा पापी, तुम्हारा बेटा भी तुम्हें पसंद नहीं करता था। बीवी तुमसे घृणा करती थी। और तुम जनता के सेवक बने फिरते थे।’’ चित्रगुप्त ने गुस्से में कहा।
चित्रगुप्त का क्रोध देखकर शनिचर की सारी नेतागिरी हवा हो गयी। उसे अब काफी डर लग रहा था कि चित्रगुप्त ना जाने क्या आरोप लगा दें। उनके कैसे-कैसे प्रश्नों का सामना करना पड़े। चित्रगुप्त के प्रश्नों से बचने के लिए शनिचर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘महाराज, अब मैं ना स्वर्ण जाना चाहता हूं और ना ही धरती पर, मुझे नरक में ही भेज दें। मैं अपने सारे गुनाह कबूल करता हूं। मैं पापी हूं, दुष्ट, नालायक और वह सबकुछ हूं, जो इस तरह के व्यक्ति को कहा जाता है। कृपया मुझे नरक भेज दें, महाराज।’’ 
शनिचर की बात पर चित्रगुप्त उसे तीरछी नजर से देखने लगे और बोले, ‘‘यह तुम्हारा अनुरोध है या मुझे आदेश दे रहे हो !’’
‘‘मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं महाराज।’’
‘‘हूं ... ठीक है। जाओ, मैं तुम्हें नरक भेजता हूं। वहां तुम्हारे कई साथी व कार्यकर्ता पहले से ही सजा भोग रहे हैं। तुम भी उनके साथ जाकर काम में लग जाओ। और हां, देखो ध्यान रहे, वहां कोई ऐसा काम ना करना जिससे नरक की व्यवस्था बिगड़ जाये।’’ सभा यहीं खत्म की जाती है। चित्रगुप्त उठकर चल देते हैं। जाते-जाते नीचे धरती पर झांककर देखते हैं, शनिचर महतो के सम्मान में एक शोकसभा का आयोजन किया गया था। एक वक्ता काफी गंभीर हो बोल रहा था, ‘‘शनिचर जैसा राजनेता का यूं चले जाना हमारे समाज के लिए काफी दुखदायी है। वे एक ईमानदार, सच्चे व महान नेता थे। स्वर्ग में ईश्वर उन्हें शान्ति दे।’’ 

सोमवार, 6 जुलाई 2015

मानव की जाति

Kanchan Pathak
 फीचर@ई-मेल 
कंचन पाठक 
प्राचीन वैदिक काल से ही रीति, नीति एवं समृद्ध परम्पराओं से अलंकृत भारत भूमि में मनुष्य की पहचान उसके कर्म से होती रही है, वर्ण से नहीं। कुछ विद्वानों के मतानुसार भारतवर्ष में सनातन युग-काल से ही जाति-प्रथा का विभेद चला आ रहा है, परन्तु यह बात सत्य प्रतीत नहीं होती। पुरा वैदिक काल में वर्ण की बजाय कर्म की महत्ता स्थापित थी। कर्म-भ्रष्ट मनुष्य हीन माना जाता था। कालान्तर में विदेशी आक्रमणकारियों एवं संस्कृतियों के प्रभाववश पुराने रीति, नीति एवं मूल्य शनैः-शनैः लुप्त होते गए एवं मानसिक विभेद का वर्चश्व कायम होता चला गया। आगे चलकर यही विभेद जातीय एवं वर्णीय कट्टरता में परिणत हो गया। मनुष्य मनुष्य न रहकर जातियों एवं वर्णों में तब्दील हो गया! वह भूमि, जहां पहले सबकुछ सांझा हुआ करता था, धीरे-धीरे कई जाति, वर्ण और समुदाय में बंट गया। इस क्रम में मनुष्य का एक कमजोर वर्ग निरन्तर पिछड़ता चला गया और अन्ततः उसने स्वयं को अछूत, अस्पृश्य आदि की श्रेणी में विवश खड़ा पाया। 
खैर, अस्पृश्यता के मूल कारण चाहे जो भी रहे हों, पर इससे घृणित कार्य कुछ और हो ही नहीं सकता। 
मानव होकर मानव के एक समुदाय से जात-पात और छुआछूत का विभेद रखना, आतक-पातक जैसी वाहियात भावनाएं रखना, इन सबसे जघन्य और क्या होगा। एक समय था, जब अछूत कहे जाने वाले एक वर्ग के लिए विद्यालयों में अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी। न केवल उन्हें सार्वजनिक जलाशयों या कुंओं से पानी लेने पर प्रतिबन्ध था, बल्कि मंदिरों में भी उनका प्रवेश वर्जित था। अब इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जिन पतितपावन प्रभु श्रीराम ने भीलों कीलों को गले लगाया, बड़े ही प्रेम से शबरी के जूठे बेर खाए, उन्हीं का द्वार इनके लिए बंद रखा गया। 
महात्मा गांधी में कहा था - अस्पृश्यता हमारे राष्ट्र का अभिशाप है। यह हिन्दू जाति का कलंक है। स्वामी दयानन्द और आचार्य विनोवा भावे ने भी इन अस्पृश्य कहे जाने वाले समुदाय को प्रेम से बाहों का सहारा दिया। 1955 ईस्वी में सरकार ने अस्पृश्यता उन्मूलन अधिनियन पारित कर कानून का मजबूत सहारा और सघन छांव भी इन्हें प्रदान किया। इसके अलावा बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने जिन्होंने स्वयं दलितों की प्रताड़ना भोगी थी, का इन समुदायों के उत्थान के लिए किया गया प्रयास युगों तक भुलाया नहीं जा सकता। इन सबके बावजूद दलितोत्थान एक राजनीतिक और स्वार्थ का खेल ही बनकर रह गया। दलितों का एक वर्ग ही तरक्की कर पाया, जबकि जो वास्तविक जरुरतमन्द थे, वे वंचित ही रहे। कुछ अयोग्य और मतलबपरस्त लोग करोड़पति, अरबपति होकर भी जातिगत फायदा लेते ही गए और अन्य वास्तविक दलितों पिछड़ों तक वह लाभ पहुंचने ही नहीं दिया गया। इस प्रकार के असन्तुलित रवैये से किसी का भी भला नहीं हो सकता। 
अन्त में यही कहना चाहूंगी कि यदि हम अपने राष्ट्र और मानव समुदाय का उत्थान चाहते हैं, तो यह जातपात, भेदभाव आदि को खत्म कर समाज में नयी जागृति और नई चेतना का मंत्र फूंकना होगा। जाति के नाम पर समूचे राष्ट्र की केवल एक जाति हो ... मानव की जाति। और आरक्षण के लाभ के नाम पर एक ही नियम ...वास्तविक रूप से गरीब और पिछड़े के लिए। यह वास्तविक जरूरतमंद चाहे जिस भी जाति के हों, इन्हें फायदा मिले। कारण कि आज दलितों का एक और वर्ग भी सामने आ रहा है। सवर्ण दलितों का, जो अस्पृश्य तो नहीं माना जाता, पर आर्थिक, सामाजिक रूप से निरन्तर पिछड़ता हुआ उसी दयनीय अवस्था को प्राप्त है। 
परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

शनिवार, 6 जून 2015

सिसिल बने प्रदेश कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के उपाध्यक्ष

Cecil Shah
 न्यूज@ई-मेल 
पटना : सिसिल साह को बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक विभाग का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। इससे पहले सिसिल प्रदेश कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के संयोजक थे। श्री साह शुरू से ही कांग्रेस से जुड़े रहे हैं और ईसाइयों में उनकी काफी अच्छी पकड़ है। अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों को वे प्रमुखता से उठाते रहे हैं। 
उन्होंने बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष पद पर बिहारी ईसाई को मनोनीत करने के संबंध में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एवं बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग में पत्र लिखा। साथ ही, श्री साह ने पटना सिटी स्थित पादरी की हवेली, महागिरजाघर को पर्यटक स्थल घोषित करवाने में अहम भूमिका निभायी। इनके प्रयास से ही बिहार सरकार ने पादरी की हवेली, महागिरजाघर को पर्यटक स्थल घोषित किया। इसके अलावा गुड फ्राइडे के अवसर पर हर साल ये सर्वधर्म सद्भावना प्रार्थना सभा का आयोजन करते हैं। क्रिसमस के अवसर पर साम्प्रदायिकता रथ निकालते हैं। राजधानी के गिरजाघरों में सद्भावना बनाएं रखने की दिशा में भी श्री साह का प्रयास उल्लेखनीय रहा है। साथ ही बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की दिशा में हर संभव प्रयास करते रहे हैं। श्री साह के उपाध्यक्ष मनोनीत किये जाने पर रवि रोशन, राजू साह, पप्पू विलियम आदि ने खुशी जतायी है। साथ ही आगामी विधान सभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवार बनाये जाने की मांग ईसाई समुदाय कर रहा है।

शुक्रवार, 5 जून 2015

दो पाटों के बीच पीस रहे बिन्दटोली के दलित

Alok Kumar, Writer
 न्यूज@ई-मेल 
आलोक कुमार
पटना : राजधानी के पश्चिमी भाग में गंगा किनारे करीब 200 घरों का एक गांव है, नाम है बिन्दटोली। काफी पुरानी दलितों की बस्ती है यह। आबादी यही कोई 18 सौ के आसपास होगी। यहां के कुछ लोग पट्टा पर जमीन लेकर खेती करते हैं, कुछ मजदूरी। इसी से इनका गुजारा चलता है। इस गांव में जाने के लिए एक कच्ची सड़क है। आजतक बिजली नहीं पहुंची है। साथ ही बरसात के दिनों में जब गंगा का पानी बढ़ता है, तो गांव के किनारे का अधिकां घर पानी में डूब जाता है। सांप, बिच्छू तैरने लगते हैं। किसी तरह लोग 2-3 माह गुजारते हैं। जब गंगा का पानी उतरता है, लोग चैन की सांस लेते हैं। लेकिन, अब यहां एक दूसरी समस्या आ खड़ी हुई है। 
बिन्दटोली के लोग बताते हैं कि हमलोग रैयती जमीन पर रहते हैं। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि बिन्द समुदाय के लोग खास महाल की भूमि पर रहते हैं। यह मौजा दीघा दियारा थाना नं. 1/2, खाता सं. 82, 71, 36, 93, 196 का अंश है। इसका खसरा सं. 272 से 276 का अंश है। इसे सरकार ने दीघा रेलपुल परियोजना हेतु हस्तान्तरित कर दिया है। इस तरह ये गांव के लोग अनाधिकृत रूप से बसे हुए हैं। 
बताते चलें कि लालटेन युग में रहने वाले इन लोगों ने अब गांव में बिजली लाने का प्रयास शुरू कर दिया है। इसी संदर्भ में अब एक नया मामला सामने आ गया है। गांव के ही मेघनाथ महतो कहते हैं कि कोई एक सौ लोगों ने नोटरी से 150 रुपए देकर कागजात तैयार करवाए। फिर आवेदन पत्र तैयार कर पाटलिपुत्र औद्योगिक प्रांगण में स्थित बिजली विभाग के दफ्तर में जमा करवाया गया। इसपर बिजली विभाग ने सभी आवेदकों को रकम जमा करने को कहा। प्रति आवेदक को 875 रुपए जमा करना था। इनमें 79 आवेदकों ने 875 रुपए जमा कर दिए। कुछ दिनों के बाद 42 लोगों को रकम प्राप्ति की रसीद भी मिल गई। बाकी लोगों को रसीद नहीं दी गयी। अब आवेदकों द्वारा बिजली विभाग में जमा 69125 रुपए फंस गए। 
मेघनाथ बताते हैं कि बिन्दटोली के आवेदकों से बिजली विभाग ने दीघा रेल परियोजना के अधिकारियों द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र पेश करने को कहा गया। ज्ञात हो कि इस समय सरकार द्वारा बिन्दटोली के लोगों को हटाने की बात हो रही है। इस संबंध में 10 जून, 2015 को अंचल अधिकारी, पटना सदर के साथ बैठक होने वाली है। बताया जाता है कि उस समय बिन्दटोली के लोग रैयती जमीन का दस्तावेज पेश करेंगे। अगर बिन्दटोली के लोगों द्वारा पेश दस्तावेज का दावा खोखला साबित होता है और प्रशासन का दावा सही निकलता है, तो खास महाल की भूमि पर बसने वालों को भूमि पर से हट जाना पड़ेगा। अब यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि ऐसे में टकराव की स्थिति आ सकती है। साथ ही बिजली विभाग के पास जमा रकम को वापस करने की मांग होगी। ऐसे में गांव के लोग एक तरफ जमीन की जंग तो दूसरी तरफ बिजली विभाग से लड़ने को विवश होंगे।
 परिचय : आलोक कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और Mani Prime Time के लिए काफी समय से लिखते रहे हैं। आपकी रचनाएं, लेख, फीचर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं।

शुक्रवार, 1 मई 2015

‘जातिवादी समाज गुलामी व रंगभेद से बदतर’

न्यूज@ई-मेल
नई दिल्ली : अरूंधति राय ने कहा कि जातिवाद से ग्रस्त समाज गुलामी और यहां तक कि रंगभेदी समाज से भी बदतर है। वे नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में 29 अप्रैल को भारत की पहली पूर्णतः हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषी पत्रिका फाॅरवर्ड प्रेस की छठवीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रही थीं। ‘‘बहुजन राजनीति और साहित्य का भविष्य‘‘ विषय पर केन्द्रित इस कार्यक्रम में अनुप्रिया पटेल, रामदास अठावले, अली अनवर, रमणिका गुप्ता, ब्रजरंजन मणि, श्योराज सिंह बेचैन, जयप्रकाश करदम, सुजाता परमिता व अरविंद जैन सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हिस्सेदारी की।
‘यह एक महत्वपूर्ण विचार है‘, राय ने फाॅरवर्ड प्रेस की चैथी बहुजन साहित्य वार्षिकी का लोकार्पण करने के बाद कहा। वे बहुजन साहित्य व अन्याय-जनित क्रोध से जातिवाद का मुकाबला करने के विचार की बात कर रही थीं। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई लड़ते हुए भी हमें अपने दिलों में न्याय, प्रेम, सौन्दर्य, संगीत व साहित्य को संजोकर रखना चाहिए और इस लड़ाई को कड़वाहट से भरे बौने बने बिना लड़ना चाहिए।
आॅल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के मुखिया अली अनवर ने कहा कि पसमांदा, बहुजन पहले हैं और मुसलमान बाद में। हम अल्पसंख्यक नहीं कहलाना चाहते। हम तो बहुजन हैं, उन्होंने कहा। वे रामदास अठावले के इस प्रस्ताव पर चकित थे कि ऊंची जातियों के आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबके को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम इस तरह के किसी भी निर्णय के लिए मानसिक दृष्टि से तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि केवल सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन ही आरक्षण का आधार होना चाहिए।
डी-ब्राहमनाईंजिग हिस्ट्री के लेखक ब्रजरंजन मणि ने सामाजिक प्रजातंत्र की बात कही और बहुजनों के बीच मुक्तिदायिनी एकता पर जोर दिया। फिल्म निर्माता सुजाता परमिता ने कहा कि दलित-बहुजन इतिहास में संस्कृति के पुत्र रहे हैं, परंतु धर्म का इस्तेमाल उन्हें दास बनाने और उनकी संस्कृति को उनसे छीनने के लिए किया गया। अनुप्रिया पटेल ने कहा कि अगर दमित समुदाय शिक्षित हो जाएगा तो उनके नेता समझौते करना बंद कर देंगे।
श्योराज सिंह बेचैन ने बसपा को सलाह दी कि सत्ता के पीछे दौड़ने की बजाए उन्हें एक पत्रिका शुरू करनी चाहिए, क्योंकि सामाजिक, सांस्कृतिक व बौद्धिक शक्ति ही बहुजनों का सही अर्थों में सशक्तिकरण करेगी। इस मौके पर द्वितीय महात्मा जोतिबा व क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले बलीजन रत्न सम्मानों से ब्रजरंजन मणि, एआर अकेला (कवि, लोकगायक, लेखक व प्रकाशक) व डॉ हीरालाल अलावा (सीनियर रेसिंडेट, एम्स व जय आदिवासी युवा शक्ति के संस्थापक) को सम्मानित किया गया। 

रविवार, 29 मार्च 2015

शोषण के खिलाफ ‘उड़ान भरो औरत‘

 पुस्तक चर्चा 
राजीव मणि
मादा भ्रूण को जब 
राजी-खुशी
मार रहे होते उसके मां-बाप
और निर्दोष जान
यह पूछ भी नहीं पाती कि
मेरा क्या कसूर ?
या तुम दोनों मेरे द्वारा 
मारे जा रहे होते तो कैसा लगता ?
अपनी मासूमियत से 
कलेजे को चीर कर रख देने वाले 
ऐसे सवाल जहां होते 
कविता वहां होती। ---- (कविता वहां होती/पृष्ठ-80) 
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की नयी कविता संग्रह है ‘उड़ान भरो औरत‘। नारी-शक्ति को समर्पित इस संग्रह में कुल 29 कविताएं हैं। लालजी साहित्य प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। डाॅ. सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के हर गंभीर विषय पर न सिर्फ चोट किया है, बल्कि कई यक्ष प्रश्न भी सामने रखे हैं। 
बार-बार आपके पास जाता
हाई कोर्ट का आदेश
पर जूं नहीं रेंगती आपके कानों पर
आपका अवैध कब्जा हटाने के लिए 
कभी पुलिस नहीं मिल पाती
पर हम तो एक ही झटके में 
उजाड़ दिए गए
कर दिए गए बिल्कुल तहस-नहस 
पुलिस जैसे हमें उजाड़ने के लिए ही 
ट्रेनिंग करके फुर्सत में बैठी होती 
बताइए, आपने कैसा कानून बनाया है ? ---- (आपने कैसा कानून बनाया है ?/पृष्ठ-18) 
यह सिर्फ कविता नहीं, आम आदमी का दर्द है। गरीब, लाचार, असहाय का उपहास है। झोपडि़यों पर आलीशान बंगले की जीत है। पुलिस के साथ लठैतों का गठजोड़ है। ...... कानून के रक्षकों के समक्ष एक फरियाद है। लेकिन क्या समाज बदलेगा ? बदल रहा है ? और इससे भी बड़ा सवाल, क्या आज हम आजाद हैं ? ‘हमारी आजादी‘ में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाश रहे हैं डाॅ. सिंह। 
सेठों की तिजोरियों में 
राजनेताओं की कुर्सियों में 
अफसरों की फाइलों में
पुलिस की वर्दियों में 
भूमिपतियों की जमीनों में 
बहुबलियों की बांहों में 
या आतंकियों की बन्दूकों में ?
आखिर कहां गुम हो गई 
हमारी आजादी ? ---- (पृष्ठ-55) 
यह वही आजादी है, जिसकी तलाश सबों को है। इस कवि को भी। जंगल से लेकर किसानों की जमीन तक, गांव से लेकर शहर तक, चारो ओर ....! तभी तो अपनी कविता ‘शहर में चीता ...!‘ में डाॅ. सिंह लिखते हैं - 
‘शहर में चीता‘ 
टी.वी. पर आने वाला
यह समाचार 
सिरे से झूठा एवं उल्टा था
शहर में या शहर के पास
चीता नहीं
खुद चीता के पास
शहर पहुंच गया था
उसका जीना हराम करने को 
. . . . . . . 
महिला संवाददाता के चेहरे पर
पढ़ा जा सकता था सहज ही
भय को
किन्तु वह चीता से नहीं
आदमी से भयभीत थी
आदमी से -। ---- (पृष्ठ-23,24) 
कवि तमाम तरह की पीड़ा लिए हर कविता में भटकता दिखता है। लेकिन, इस दुख-दर्द का अंत कहीं होगा ? बजबजाती इस दुनिया में कभी खुशहाली आएगी ? इसी का जवाब ‘माली की अभिलाषा‘ शीर्षक कविता में डाॅ. सिंह खुद देना चाहते हैं - 
जब खिलखिलाता तुम्हारा फूल,
तुम क्यों नहीं चहक सकते ?
उसकी खुशबू से खुश होते लोग
तुम क्यों नहीं महक सकते ?
किन्तु ढील-चीलर के संग
तुम्हें झोपड़ी में रहना है। 
रोजी-रोटी की आस में
हर संकट को सहना है। 
क्या तुम्हें पता कुछ भी है माली ?
तुम्हारी मिट सकती कैसे बदहाली ?
. . . . . . . 
तुम्हारे पुष्प के बारे में बहुत कुछ
कह गया कवि कोई,
तुम्हारे दर्द की अनदेखी कर
उभार गया छवि कोई। 
बोलो माली - बोलो,
अब तुम्हें ही बोलना है। 
ऊपर-ऊपर देखने वालों का 
भेद तुम्हें ही खोलना है। 
. . . . . . . 
नहीं माली नहीं, तुम्हें हक अपना छीनना होगा।
शोषकों को हर हाल में दिन अपना गिनना होगा।। ---- (पृष्ठ-87,88)
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की यह सर्वश्रेष्ठ कविता है। शेष सभी कविताएं अच्छी हैं। छपाई सुन्दर व स्पष्ट है। पाठकों को अवश्य पसंद आयेगी। इस कविता संग्रह की सहयोग राशि है 120 रुपए।
कविता संग्रह : उड़ान भरो औरत
कवि : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह
प्रकाशक : लालजी साहित्य प्रकाशन, पटना
मुद्रक : अमित प्रिंटर्स, पटना
पुस्तक प्राप्ति : 9430604818, 9905204412

माली की अभिलाषा

Dr. Lalji Prasad, Writer-Poet
 कविता 
कवि : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह 
ऐ माली महान !
तुम्हारे पुष्प की अभिलाषा महान !
जो चाहता रौंदाना
देशभक्तों के कदमों तले आना ।
जिसे पूजनीय बनने की नहीं चाह
जिसे प्रेमी के प्यार की नहीं परवाह ।
इसके आगे उसे नहीं कोई जिज्ञासा
उसकी आशा की यही अन्तिम भाषा ।
किसी कवि की कैसी यह कोरी कल्पना है
तुम्हारे जीवन के बारे में नहीं कोई सपना है ।
रोपते रहो फूल बस यहीं तक सोचना है
बदहाली में तुम्हें तुम्हारे बच्चों को नोचना है ।
या बिलबिलाते हों भूखे तो पेट दाब सोना है
तुमको परिवार संग जीवन भर रोना है ।
फिर कैसा है फूल तेरा उसकी कैसी अभिलाषा ?
कैसा है जीवन तेरा यह कैसी तमाशा ?
जब खिलखिलाता तुम्हारा फूल,
तुम क्यों नहीं चहक सकते ?
उसकी खुशबू से खुश होते लोग
तुम क्यों नहीं महक सकते ?
किन्तु ढील-चीलर के संग
तुम्हें झोपड़ी में रहना है । 
रोजी-रोटी की आस में 
हर संकट को सहना है ।
क्या तुम्हें पता कुछ भी है माली ?
तुम्हारी मिट सकती कैसे बदहाली ?
क्या तुम्हारा पुष्प ही सिर्फ कर सकता अभिलाषा ?
तुम कह भी नहीं सकते अपने श्रम की भाषा ?
तुम्हारे पुष्प के बारे में बहुत कुछ
कह गया कवि कोई,
तुम्हारे दर्द की अनदेखी कर
उभार गया छवि कोई।
बोलो माली - बोलो,
अब तुम्हें ही बोलना है ।
ऊपर-ऊपर देखने वालों का
भेद तुम्हें ही खोलना है ।
पूछो उनसे 
कि सृजन वाले हाथ उन्हें क्यों नहीं दीखते ?
शासक अंग्रेजों का पाठ छोड़
जन-सेवा का पाठ क्यों नहीं सीखते ?
क्या नहीं तुम्हारी अभिलाषा कि हो अपनी खुशहाली ?
रहे भरा-पूरा घर अपना चारों तरफ हरियाली ?
यदि सचमुच गणों का तंत्र यह देश 
फिर तुम्हीं क्यों सहते रहो जीवन भर क्लेश ?
तुम रहो फटेहाल फूल करते रहो भेंट !
जुल्मी इस देश को करते रहें मटियामेट !
नहीं माली नहीं, तुम्हें हक अपना छीनना होगा ।
शोषकों को हर हाल में दिन अपना गिनना होगा ।
रोपते तुम विविध फूल बनाते हो चमक
नमन तुम्हें नमन है कोटिशः है नमन ।
समझता मैं तुम्हें तुम्हारी अभिलाषा
होती नहीं किसे अच्छे जीवन की आशा ?
परिचय : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह महंत हनुमान शरण काॅलेज, मैनपुरा, पटना में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष एवं बीआईटीएनए, पटना के प्रवक्ता हैं। आपकी दर्जनों कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण व बाल कहानी लालजी साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी हैं। आप पुस्तक मेला के अलावा अपनी भी पुस्तक प्रदर्शनी गांव देहातों में लगाते रहे हैं।

बुधवार, 11 मार्च 2015

नीतीश सरकार में ईसाई सर्वाधिक सुरक्षित : सिसिल

Cecil  Shah
न्यूज@ई-मेल
पटना : प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व संयोजक सिसिल साह ने मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को बहुमत सिद्ध हो जाने पर तमाम बिहारी ईसाई समुदाय की ओर से शुभकामनाएं दी है। उन्होंने आभार एवं प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि नीतीश कुमार की सरकार में ही ईसाई समुदाय सर्वाधिक सुरक्षित है। 
श्री साह ने कहा कि बिहार के ईसाइयों को अबतक हर स्तर पर नजरअंदाज किया गया है। यही वजह है कि ईसाइयों की स्थिति बेहर खराब है। राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े इस समाज को सुशासन की सरकार ही बेहतर राह दिखा सकती है। अतः मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को इसपर ध्यान देना चाहिए। 
श्री साह ने मुख्यमंत्री से मांग किया है कि ईसाई समाज से किसी बेहतर व्यक्ति को सरकार में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए जिससे कि वे इस समुदाय की विभिन्न समस्याओं के निदान हेतु सरकार के समक्ष आवाज उठा सके। उन्होंने कहा कि पूर्व की सरकारों ने अल्पसंख्यकों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है।

सोमवार, 2 मार्च 2015

सभी पाठकों को होली की शुभकामनाएं


मोटी पत्नी

  Kaka  Hathrasi  
  बुरा ना मानो होली है  
काका हाथरसी

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल 
किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फुटबौल
लिखी ठौस फुटबौल, न करती घर का धंधा
आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा
कहँ ‘काका‘ कविराय, खाय वह ठूँसमठूँसा
यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा।

2.  जम और जमाई

बड़ा भयंकर जीव है, इस जग में दामाद
सास-ससुर को चूस कर, कर देता बरबाद
कर देता बरबाद, आप कुछ पियो न खाओ
मेहनत करो, कमाओ, इसको देते जाओ
कहॅं ‘काका‘ कविराय, सासरे पहुँची लाली
भेजो प्रति त्यौहार, मिठाई भर-भर थाली।
लल्ला हो इनके यहाँ, देना पड़े दहेज
लल्ली हो अपने यहाँ, तब भी कुछ तो भेज
तब भी कुछ तो भेज, हमारे चाचा मरते
रोने की एक्टिंग दिखा, कुछ लेकर टरते
‘काका‘ स्वर्ग प्रयाण करे, बिटिया की सासू
चलो दक्षिणा देउ और टपकाओ आँसू।
जीवन भर देते रहो, भरे न इनका पेट
जब मिल जायें कुँवर जी, तभी करो कुछ भेंट
तभी करो कुछ भेंट, जँवाई घर हो शादी
भेजो लड्डू, कपड़े, बर्तन, सोना-चाँदी
कह ‘काका‘, हो अपने यहाँ विवाह किसी का
तब भी इनको देउ, करो मस्तक पर टीका।
कितना भी दे दीजिये, तृप्त न हो यह शख्श
तो फिर यह दामाद है अथवा लैटर बक्स ?
अथवा लैटर बक्स, मुसीबत गले लगा ली
नित्य डालते रहो, किंतु खाली का खाली
कहँ ‘काका‘ कवि, ससुर नर्क में सीधा जाता
मृत्यु-समय यदि दर्शन दे जाये जमाता।
और अंत में तथ्य यह कैसे जायें भूल
आया हिंदू कोड बिल, इनको ही अनुकूल
इनको ही अनुकूल, मार कानूनी घिस्सा
छीन पिता की संपत्ति से, पुत्री का हिस्सा
‘काका‘ एक समान लगें, जम और जमाई
फिर भी इनसे बचने की कुछ युक्ति न पाई।।