COPYRIGHT © Rajiv Mani, Journalist, Patna

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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

महादलितों का दर्द है ‘शुभी की दीवाली’

Dr.  Lalji  Prasad  Singh
राजीव मणि
हमारे समाज में दलितों, महादलितों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इनमें कइयों का गुजारा तो कचरा से ही चलता है। कचरा के ढेर से कागज, प्लास्टिक, लोहा चुनकर कबाड़ में बेचकर। चंद रुपए मिल जाते हैं। सब्जी-भात का इंतजाम हो जाता है। काम किया तो खाना मिला, नहीं किया तो फांका! पर्व-त्योहार और जश्न की बात तो सोचना भी इनके लिए पाप है। हां, दारू इनके जीवन का मुख्य हिस्सा है। गंदगी इनकी पहचान है। अभाव में रहना इनकी आदत बन गयी है!
समाज के इन्हीं किरदारों को अपनी कहानी ‘शुभी की दीवाली’ में उतारा है डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह ने। ‘शुभी की दीवाली’ एक बाल कहानी है। डाॅ. सिंह इस कहानी में बाल मनोविज्ञान को दर्शाने में काफी हद तक सफल रहे हैं। वहीं समाज और खुद से लड़ता एक महादलित परिवार काफी कुछ कह जाता है। इन सब के बीच एक महिला की मनोदशा दिखाने में भी डाॅ. सिंह सफल रहे हैं।
लाजमनी ने माथा ठोक लिया - ‘‘सुबह-सुबह कहां से चढ़ा के आ गया - अपना माथा खराब करके ?’’
चोट पहुंची तो तिलमिला उठा चेचर। चुनौती भरे लहजे में बोला - ‘‘विश्वास नहीं होता तो मेरा मुंह सूंघ के देख लो। आज मैंने दारू को हाथ तक नहीं लगाया है - कसम से।’’
‘‘पियक्कड़ों की बात की क्या और कसम की क्या! बात-बात में कसम खाते और बात-बात में कसम तोड़ते।’’
लाजमनी ने अविश्वास करते हुए आदेश दिया - ‘‘शुभी, सूंघो तो जरा अपने बाप का मुंह। पीके अल-बल बोल रहा और कह रहा कि हाथ तक नहीं लगाया है।’’
कहानी के केन्द्र में दीवाली है। और इसी के बहाने समाज के यथार्थ को सामने लाया गया है। कहानी की चंद पंक्तियां ही काफी कुछ कह देती हैं।
‘‘बस-बस! अब बस भी करो।’’ लाजमनी गरम हो उठी - ‘‘मैं समझ गई - जिन्दगी में तुमसे कुछ नहीं होने वाला। दिन भर निठल्लई करते और दारू पीके बतकटई करते चलते।’’ वह अपनी किस्मत को कोसने लगी - ‘‘हे भगवान! मैं कैसे ऐसे मर्दाना के साथ बंध गई! यह सिर्फ बच्चे पैदा करना जानता और उनसे कचना चुनवाना। काम तो छू के नहीं करना चाहता। उस पर बोली तो पहाड़ जैसी!’’
चेचर सफाई देना चाहता - ‘‘तुम बेकार मुझ पर गरमा रही हो। लाखों-करोड़ों लोगों के घरों में रात को सालों भर दीये नहीं जलते।’’
कहानी की भाषा आम बोलचाल की है। सरल और सुगम्य। पति-पत्नी के बीच का संवाद ठीक वैसा ही, जैसे इन महादलितों के घरों में बात होती है। इन सब के बीच बच्चों की मनोदशा देखने लायक है।
चेचर चनचना रहा था - ‘‘कामचोर कहीं के! चले हैं दीवाली मनाने! घर में अन्न-दाना का ठिकाना नहीं और -? भाग्य आजमाने के लिए (जुआ खेलने के लिए) बंगराम के पास कुछ पैसा रख छोड़ा था, उसे भी उड़ा-पड़ा दिया!’’
वह सब देखकर शुभी को तो पहले ही जैसे काठ मार गया था। चेचर उसकी तरफ बढ़ा - ‘‘का रे, उसके साथ तू भी सनकने गई थी ?’’ कहते हुए उसने उसके गाल में एक जोरदार थप्पड़ जमा दिया। शुभी ऐसी गिरी कि हिली-डुली भी नहीं। लाजमनी उसके पास गई तो दहाड़ मार के रो उठी - ‘‘अरे बचाओ ए लोगों, मेरी शुभिया को मार डाला। अरे निस्सतनिया चेचरा, मार डाला रे मेरी बिटिया को।’’
शुभी को डाॅक्टर के पास ले जाया जाता है। दवा-दारू की जाती है। और अंततः ठीक तो हो जाती है, लेकिन अंधी होकर।
कहानी का यह एक कड़वा सच है। इन लोगों में अधिकांश की मौत बीमारी या किसी तरह के हादसे से ही होती है। कुछेक ही अपनी पूरी जिन्दगी देख पाते हैं।
लालजी साहित्य प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। छपाई साफ-सुथरी है। आवरण आकर्षक है। कीमत 60 रुपए रखी गयी है।

सोमवार, 25 नवंबर 2013

सुशासन में ऐसे होता है जमीन पर कब्जा

न्यूज@ई-मेल
बिहार सरकार द्वारा 9 दिसम्बर, 2011 को 14 महादलितों के बीच जमीन का पर्चा वितरण किया गया। 25 सालों से इन्तजार के बाद इन्हें यह सरकारी कागज मिल सका। उसपर संगठित दबंगों ने जमीन पर अधिकार पाने के लिए महादलितों को दबाना शुरू कर दिया। आखिरकार दबंगों की करतूतों के कारण महादलितों को विस्थापित होना पड़ा। सरकार के तमाम कानून दबंगों के आगे छोटा पड़ गये।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र भोजपुर जिले के गड़हनी प्रखंड का यह मामला है। इस प्रखंड में बलिगांव नामक ग्राम पंचायत है। इस पंचायत की मुखिया धनकेशरी देवी हैं, जो महिलाओं की इज्जत सुरक्षित रखने में अक्षम हैं। उनके पति आनंद पासवान ही पंचायतों का कार्य किया करते हैं। इस कारण महिला मुखिया से उम्मीद करना बेइमानी है। खैर, इसी पंचायत में महथिन टोलाडीह है। यहां पर 25 सालों से महादलित पासी समुदाय के लोग रहते थे। गौपाल चौधरी का कहना है कि जिस जमीन पर हमलोग रहते थे, उसी जमीन का पर्चा सरकार द्वारा 9 दिसंबर, 2011 को मिला।
पर्चा मिलते ही दबंगों का खेल शुरू हो गया। महथिन टोला गांव के दबंग शिवराज महतो, चन्द्रशेखर महतो, कृष्णा बिहारी, समई यादव, श्रीभगवान यादव संगठित हो गये। ये कहने लगे कि जो महथिन टोलाडीह की जमीन मिली है, वह जमीन हमलोगों की है। वे जमीन पर जबरन मिट्टी भरवाने लगे। पर्चाधारी महादलितों ने इसका विरोध किया, पर दबंगों पर कोई असर नहीं हुआ। वे महादलितों को गाली देकर धमकाने लगे। अगर नहीं भागते हो तो जमीन पर जबरन कब्जा कर लेंगे। इतना हो ही रहा था कि लाठीधारी आकर लाठी चलाने लगे। लाठी चलाने से दहशत पैदा नहीं कर सकने पर दबंगों ने गोली चलानी शुरू कर दी। इसमें छह महादलित घायल हो गये। घायल होने वालों में गोपाल चौधरी, अशोक चौधरी, मुन्ना चौधरी, लक्ष्मी देवी, बुधन चौधरी और दुधनाथ चौधरी शामिल हैं। इस वारदात में दो पूर्णतः विकलांग हो गये। जिस जमीन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, उसपर घर बनाकर रहने वालों की पूरी संपत्ति लूट ली गयी। इसमें गोपाल चौधरी के धान कूटने वाली और गेहूं पीसने वाली मशीन भी शामिल है। पुलिस को सूचना दी गयी। आते ही भीड़ और हमलावर को हटाने के लिए वह लाठी-डंडा चलाने लगी। पुलिस ने महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। कई महादलित घायल हुए।
लाठी-गोली से घायलों का इलाज सदर अस्पताल, आरा में हुआ। इसपर महादलितों ने निर्णय लिया कि अब वे सरकार के द्वारा पर्चा मिली जमीन पर जाकर नहीं बसेंगे। अगर फिर से उक्त जमीन पर कदम रखेंगे, तो इस बार दबंग उनकी हत्या कर देंगे। पुलिस भी दबंगों पर कार्रवाई नहीं कर रही थी। आज गोपाल चौधरी, दुधनाथ चौधरी, बुधन चौधरी, चंदन चौधरी, सत्येन्द्र चौधरी, अशोक चौधरी, मुन्ना चौधरी, भरत चौधरी, विजय चौधरी और रामजी चौधरी महथिन टोलाडीह को अलविदा कह धवनियां गांव में जाकर बसने को मजबूर हैं। इन लोगों ने बहुत ही छोटा घर बना रखा है। किसी तरह जिन्दगी कट रही है।

शौचालय के नाम पर सरकारी खेल

पिछले ही दिनों गया के डोभी प्रखंड के कांजियार गांव की बात है। सुशीला देवी शौच के लिए खेत में गयी थी। बदमाशों ने पहले सुशीला के साथ बलात्कार किया और फिर हत्या कर दी। वह बोधगया भूमि आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सौदागर दास की पत्नी थी। अभी तक इस कांड में एक की ही गिरफ्तारी हो सकी है। यह कोई नयी बात नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं अकसर होती हैं।
23 नवम्बर, 2013 को ही विश्व शौचालय दिवस घोषित किया गया है। दूसरी तरफ गांव के घरों की स्थिति तो क्या, विद्यालयों की स्थिति भी देखी जा सकती है। प्राथमिक विद्यालय कमालपुर, मानपुर के शौचालय की स्थिति को आप देख सकते हैं। पानी के अभाव में शौचालय की दुर्दशा झलकती है। अभी यह होता है कि एक विभाग के द्वारा शौचालय का निर्माण करा दिया जाता है। उसके बाद दूसरे विभाग के द्वारा पानी की व्यवस्था की जाती है। तीसरे के द्वारा सफाई की व्यवस्था होती है। यही कारण है कि सरकारी विद्यालयों के शौचालय का यह हाल है। यह किसी एक विद्यालय की बात नहीं, करीब-करीब सभी की है।
हालात यह है कि सूबे के लाखों महादलित, गरीब, आदिवासी, अत्यंत गरीब लोगों के पास शौचालय नहीं है। इसके कारण हैं गरीबी और अपर्याप्त जमीन। अभी इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत गरीबों को जो जमीन दी जाती है, उसमें एक बड़ा कमरा या एक छोटा कमरा और एक छोटा बरामदा ही बनाया जा सकता है। इसके बाद जमीन बचती ही नहीं है। इसी कारण खामियाजा महिलाएं, किशोरी एवं बच्चियों को भुगतना पड़ता है। उन्हें दुष्कर्म का शिकार होना पड़ता है।
इधर सरकार और सरकारी आंकड़ों की कारीगरी भी देखना जरूरी है। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश भी घर-घर शौचालय निर्माण करने की वकालत करते हैं। निर्मल भारत अभियान के तहत 9 हजार रुपए दिये जाते हैं। वहीं वाटर एड के परियोजना निदेशक बृजेन्द्र कुमार कहते हैं कि जुलाई, 2013 से शौचालय निर्माण पर 9100 रुपए दिये जा रहे हैं। बीपीएल परिवारों को व्यक्तिगत शौचालय के निर्माण पर सरकार 9100 रुपए आर्थिक सहायता दे रही है। यह राशि लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग व ग्रामीण विकास विभाग की ओर से दी जा रही है। केन्द्र सरकार के निर्मल भारत अभियान से 4600 रुपए व मनरेगा के तहत 4500 रुपए दिये जा रहे हैं। लाभार्थी के जॉब कार्ड से मनरेगा की राशि की निकासी की जाती है। वहीं लाभार्थी को अपने पास से 900 रुपए का योगदान करना पड़ता है। इस तरह से एक यूनिट शौचालय निर्माण पर 10 हजार रुपए व्यय होगा! लेकिन, हकीकत कुछ और है।

विश्व शौचालय दिवस पर रैली

विश्व शौचालय दिवस 19 नवम्बर को मनाया गया। इस अवसर पर गांवघर में जन जागरण पैदा किया गया। इसे वाटर एड इंडिया ने मिशन बना लिया है। अब वाटर एड इंडिया ने निर्मल भारत अभियान के तहत सरकार को सहयोग भी देना प्रारंभ कर दिया है। गांवघर में जन जागरण के साथ स्कूली बच्चों को निर्मल भारत अभियान की जानकारी दी जा रही है। और तो और बच्चे घर-घर जाकर अभिभावकों को घरेलू शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। बच्चों का कहना मानकर अभिभावक आवेदन दे रहे हैं। सब ठीक चला तो निर्मल पंचायत घोषित करवाने में लोग पीछे नहीं रहेंगे। कई क्षेत्रों में तेजी से घरेलू शौचालय का निर्माण होने लगा है।
इधर फतेहपुर में रैली निकाली गयी। इसमें राजकीय मध्य विद्यालय, कांति, नौर्थ लॉडवे के 875, उत्क्रमिक मध्य विद्यालय, बुद्धहॉल, मतासो के 88, मध्य विद्यालय, डिहरी, नीमी के 405 और उत्क्रमिक विद्यालय, पहाड़पुर के 412 परिजन व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। इसके बाद सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि 2011 के जनगणना के अनुसार, देश से 3.75 करोड़ शौचालय गायब हैं। यह भी सत्य है कि आज भी 626 मिलियन लोग खुले में शौच करने को बाध्य हैं। इस अवसर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के वक्तव्य का स्वागत किया गया, जिसमें उन्होंने नगर निकाय और पंचायत चुनाव में तकदीर चमकाने वाले नेताजी के घर में घरेलू शौचालय होना अनिवार्य कर दिया है।

अब रिंकी का क्या होगा

पटना जिले के दानापुर प्रखंड में कौथवा पंचायत है। यहीं कौथवा मुसहरी में उमेश मांझी रहते हैं। इनके पुत्र विजय मांझी (35 साल) की शादी रिंकी देवी के साथ पांच साल पूर्व हुई। इस बीच रिंकी का गर्भधारण हुआ। दुर्भाग्य से रिंकी का गर्भपात हो गया। रिंकी का मायका संपतचक थानान्तर्गत कच्छुआरा के कन्नौजी गांव में है। वहीं विजय मांझी गया था। खाना खाने के बाद छत पर जाकर सो गया। नींद से उठकर चलने पर विजय मांझी छत से गिर गया। वह ठेला चालक था। इसके अलावा कभी मजदूरी करके परिवार का लालन-पोषन करता था। उसी समय विजय मांझी को पटना मेडिकल काॅलेज हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया। 14 नवम्बर, को वह मर गया। अब उसकी विधवा की स्थिति काफी दयनीय है।

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं!


‘पर्चा मेरे साथ और जमीन किसी और के हाथ’

न्यूज@ई-मेल
बोधगया में सरकार द्वारा 9 दलितों को 32 डिसमिल जमीन दी गयी। इसपर देवनन्दन महतो के पुत्र युगल किशोर प्रसाद और कपिल लाल के पुत्र राजू लाल जबरन खेती कर रहे हैं। 
बोधगया प्रखंड के मोचारिम ग्राम पंचायत के मोचारिम मुसहरी के लोगों ने बताया कि रामपति मांझी के पुत्र राजेश मांझी को 3 डिसमिल, विफा मांझी के पुत्र राजेन्द्र मांझी को 4 डिसमिल, दुःखन मांझी के पुत्र रामटहल मांझी को 3 डिसमिल, झगरू मांझी के पुत्र बच्चू मांझी को 4 डिसमिल, अर्जुन मांझी के पुत्र शंकर मांझी को 4 डिसमिल, जागो मांझी के पुत्र कामेश्वर मांझी को 3 डिसमिल, आदित्य चैधरी के पुत्र नरेश चाौधरी को 4 डिसमिल, रामचन्द्र पासवान के पुत्र जगनारायण पासवान को 4 डिसमिल और पांची मांझी के पुत्र कुलेश्वर मांझी को 3 डिसमिल जमीन मिली है। परवाना 2000-01 में बना, लेकिन 5 साल के बाद दलितों के बीच परवाना का वितरण किया गया। इसपर वार्षिक लगान देना होगा। लगान प्रति एकड़ 10 रुपए लिया जाएगा। बन्दोबस्त की गयी भूमि विरासत योग्य होगी, परन्तु अन्तरणीय नहीं होगी। इसपर अनुमंडल अधिकारी, भूमि सुधार उप समाहर्ता और अंचल अधिकारी के हस्ताक्षर हैं। 
जब 2000-01 में बन्दोबस्त का परवाना दलितों को 2006 में वितरण किया गया, दलित खुश हो गये। लेकिन, खुशी बहुत दिनों तक नहीं रही। जब परवानाधारी को पता चला कि उनकी जमीन पर दबंग देवनन्दन महतो के पुत्र युगल किशोर प्रसाद और कपिल लाल के पुत्र राजू लाल का कब्जा है, तो दलित परेशान हो उठे। दलित उसी समय से अंचल कार्यालय और राजस्व कर्मचारी का चक्कर लगाने लगे। मगर अंचल कार्यालय के अधिकारी दलितों को सहयोग करने के पक्ष में नहीं दिखे। 
रामटहल मांझी कहते हैं कि हमलोगों को अधिकारी टहला रहे हैं। हारकर हमलोगों ने 1 अगस्त, 2013 को गया जिले के जिला पदाधिकारी को आवेदन दिया। सरकार के द्वारा वितरित परवाना की छायाप्रति संलग्न की गयी। इसमें सभी 9 परवानाधारी के हस्ताक्षर हैं। कृत मांझी का कहना है कि हाल में ही जमीन के अधिकार प्राप्त करने वाले कुलेश्वर मांझी का निधन हो गया। कुलेश्वर मांझी मेरे पिता थे। अब मैं ही अन्य दलितों के साथ दौड़धूप कर रहा हूं। 
जिला पदाधिकारी को दिये गये आवेदन पत्र में उल्लेख किया गया है कि हम दलितों की बात कोई नहीं सुनता। अंचल अधिकारी और राजस्व कर्मचारी, बोधगया को कई बार डिमाण्ड कायम एवं भूमि सीमांकन करने के लिए आवेदन दिया गया। परन्तु अभी तक न तो डिमाण्ड कायम किया गया और न ही सीमांकन। अभी उस जमीन को युगल किशोर प्रसाद, पिता देवनन्दन महतो और राजू लाल, पिता कपिल लाल द्वारा जबरन जोता जा रहा है। जांच कर हमें न्याय मिले और दोषियों को सजा।

रविवार, 3 नवंबर 2013

कब थमेगी दलित महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं

राजीव/आलोक
दलितों के साथ हमेशा से शोषन होता रहा है। महिलाएं कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुई हैं। सरकारी आकड़ों के अनुसार, बिहार में 2012 में कुल 4950 घटनाएं अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत दर्ज की गयीं। इनमें 191 घटनाएं केवल दलित महिलाओं पर हुए बलात्कार की थीं। इसके अलावा घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, राजनीतिक हिंसा और डायन का आरोप लगाकर प्रताडि़त करना जैसी घटनाएं इनके जीवन का हिस्सा बनीं। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि एक तिहाई से भी कम महिलाएं शिकायत निवारण प्रणाली तक पहुंच पाती हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का अंत किया गया तथा अनुच्छेद 366, 341 व 342 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को परिभाषित कर व्याख्या की गयी। इस वर्ग को शोषण और अत्याचार से मुक्त कराने के उद्देश्य से 1989 में संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया। कानून के अंतर्गत विशिष्ठ न्यायालयों का गठन करने का प्रावधान किया गया। कानून बनने के लगभग दो दशक बाद, हाल ही में, बिहार के 5 जिलों (पटना, मुजफ्फरपुर, गया, भागलपुर एवं बेगूसराय) में दलितों के लिए विशिष्ठ न्यायालयों की स्थापना की गयी है। इसके अतिरिक्त, दलित उत्पीड़न के दर्ज केसों के त्वरित निराकरण के लिए बिहार में सर्वाधिक (184) फास्ट ट्रैक न्यायालयों का गठन किया गया। बावजूद इसके लगभग 80 हजार केस आज भी विचाराधीन हैं। अतः इस तरह के न्यायिक ढांचे ज्वलंत समस्याओं के लिए अल्पकालीन निवारण मात्र हैं और इन ढांचों में दलित महिलाओं की समुचित सहभागिता के लिए कोई उचित स्थान नहीं है।
घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा के लिए वर्षों के अथक प्रयास के बाद 2005 में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (पीडब्ल्यूडीवीए) पारित किया गया। इस विधेयक को लागू करने के लिए व्यापक नियम बनाये गये, परन्तु इनका पालन बिहार में केवल महिला हेल्प लाइन के माध्यम से किया जा रहा है। इस कानून के प्रचार-प्रसार तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश न के बराबर की गयी है। 
ग्रामीण स्तर पर ज्यादातर घरेलू हिंसा के मामले ग्राम कचहरी में दर्ज किये जाते हैं। एक तरफ जहां महिलाओं के प्रति हिंसा बढ़ी है, वहीं दलित महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रयास हो रहे हैं। अभी तक किये गये सारे प्रयास नाकाफी हैं।

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

‘मालिक’ के सहारे दलित-महादलित का जीवन

न्यूज@ई-मेल
आजतक दलित और महादलितों की स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है। पटना से सटे दानापुर प्रखंड की स्थिति यह है कि 17 महादलितों को परवाना मिला, लेकिन 25 वर्षों के बाद भी वे जमीन पर कब्जा नहीं कर सके हैं। महादलित आज भी अज्ञानता के दलदल में फंसे हैं। बोधगया में मात्र सात किलोमीटर की परिधि में आंगनबाड़ी, राजकीय मध्य विद्यालय, अच्युतानंद आदर्श उच्च विद्यालय और बोधगया में काॅलेज है। अतिया ग्राम पंचायत के आनंदगढ़ टोला में 250 घरों में महादलित रहते हैं। केवल विजय मांझी ही मैट्रिक पास है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह क्षेत्र नालंदा में महादलित बेहाल हैं। कमता पंचायत के कमता गांव में महादलित मुसहर समुदाय के लोग रहते हैं। आजतक कोई भी वंदा यहां मैट्रिक उत्र्तीण नहीं हो सका है। नक्सल प्रभावित जहानाबाद में मान्दे बिगहा आदर्श ग्राम पंचायत है। यहां के मुखिया तेजप्रताप सिंह का कहना है कि इस पंचायत में 17 गांव हैं। इसमें 10 राजस्व गांव हैं। 16 गांवों में महादलित और दलित रहते हैं। मुसहर, पासवान, पासी, चौधरी, नट आदि समुदाय के लोग हैं यहां। इनमें से सबसे अधिक मुसहर समुदाय की हालत खराब है। मान्दे बिगहा मुसहरी के धर्मेन्द्र मांझी का कहना है कि हमलोग 150 सालों से सड़क के किनारे रहते आ रहे हैं।
भोजपुर में 16 बार नरसंहार हुआ है। आज भी भोजपुर में दबंगों को ‘मालिक’ कहा जाता है। इन तथाकथित मालिकों के द्वारा बंधुआ मजदूर रखना शान-शौकत की बात समझी जाती है। भले ही खेत जोतने के लिए उनके पास हल के साथ एक जोड़ा बैल न हो। वे मुसहर को ही हलवाहा के रूप में रखना चाहते हैं। 
नक्सल प्रभावित क्षेत्र बांका जिले की खबर भी कुछ अच्छी नहीं है। यहां दो सौ सालों से चांदन प्रखंड के धनुवसार पंचायत और लोहटनियां गांव में विकास नहीं हो सका है। इस समय धनुवसार ग्राम पंचायत की मुखिया विनीता देवी हैं। लोगों का कहना है कि जनप्रतिनिधि और नौकरशाहों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है। इसी कारण 200 सालों में केवल दो ही वंदा यहां मैट्रिक उत्र्तीण हो सका। 
1990 से 15 सालों तक बिहार में सामूहिक नरसंहार का दौर चला। 25 जुलाई, 1995 से 16 जून, 2000 तक 18 बार सामूहिक नरसंहार किया गया। कुल 273 लोगों की हत्या की गयी। वहीं लाल सामंतियों द्वारा 7 बार सवर्णों की हत्या की गई। इसमें 75 लोगों की जान गयी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा गठित बिहार भूमि सुधार आयोग के अध्यक्ष देवव्रत बंधोपाध्याय की अनुशंसा रिपोर्ट में दर्ज है कि लालू-राबड़ी के सत्ता परिवर्तन के साथ ही नरसंहार पर नियंत्रण पा लिया गया। इसके बाद जदयू-भाजपा गठबंधन में नरसंहार पर अंकुश लग गया। कुछ जगहों की घटना अपवाद मानी जा सकती है। अब जदयू और भाजपा के बीच तलाक हो जाने के बाद बिहार की स्थिति बिगड़ने लगी है। बगहा में पुलिसिया फायरिंग में 8 थारू आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया। ऐतिहासिक बोधगया मंदिर में आतंकी हमला किया गया। मशरक में मिड डे मील खाने से 23 बच्चों की अकाल मौत हो गयी। इसके बाद चापाकल में जहर डालने की हरकत शुरू कर दी गयी है। इन घटनाओं से बच्चे दहशत में हैं। एक-दो नहीं, कई घटनाएं हैं यहां।
दानापुर प्रखंड में रूपसपुर नहर के किनारे राजकुमारी देवी रहती है। वह कहती है कि सरकार द्वारा 25 साल पहले जमीन का परवाना (पर्चा) मिला। इसे लेकर हमलोग दर-दर भटकने को मजबूर हैं। हालांकि दानापुर प्रखंड के अंचलाधिकारी कुमार कुंदन लाल ने फील्ड में आकर जमीन का मुआयना किया। नहर किनारे ही अभिमन्यु नगर है। यहीं के 17 परवानाधारी मुसहरों को सीओ ने आश्वासन दिया कि आने वाले ढाई महीने के अंदर सभी परवानाधारियों को जमीन पर कब्जा दिलवा दिया जाएगा। 
लालू-राबड़ी सरकार में 1987-88 में जमीन की बन्दोबस्ती हुई थी। आवासीय भूमिहीनों को मात्र 2 डिसमिल जमीन घर बनाकर रहने को दिया गया। दुखद पहलू यह है कि लालू-राबड़ी शासन में ही स्थानीय दबंग महादलितों पर कहर बरपाने लगे। उनको लाठी के बल पर टीकने नहीं दिया गया। उसी समय से 17 परवानाधारी पिछले 25 सालों से जमीन का परवाना लेकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं। 
बोधगया के अतिया ग्राम पंचायत के जन प्रतिनिधि आनंदगढ़ टोला के लोगों की मदद नहीं कर रहे हैं। यहां गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों को पीला कार्ड (अंत्योदय) और लाल कार्ड बनाने में मनमानी की गई है। कुछ लोगों का पीला कार्ड और 248 लोगों का लाल कार्ड बनाया गया है। साथ ही पीला और लाल कार्डधारियों को हर महीने जनवितरण प्रणाली की दुकान से राशन-किरासन उपलब्ध नहीं कराया जाता है। इसे लेकर लोगों में आक्रोश है।
पूअरेस्ट एरिया सिविल सोसायटी पैक्स के सहयोग से प्रगति ग्रामीण विकास समिति द्वारा बोधगया प्रखंड के पांच पंचायतों में कार्य किया जाता है। संस्था के अनुसार, ग्राम पंचायत अतिया के कुछेक लोगों के पास बासगीत पर्चा है। बिहार सरकार द्वारा सर्वे कराने के बाद अच्युतानंद आदर्श गिरि की जमीन को बिहार सरकार की जमीन घोषित कर दी गयी। इसके बाद इन्दिरा आवास योजना से 8 महादलितों के मकान बनवाये गये हैं। शेष योजना के इंतजार में हैं। खबर यह भी है कि पंचायत की मुखिया मुनिया देवी द्वारा योजना से राशि दिलवाने के नाम पर 500 रुपए डकार लिये गये हैं। केन्द्र सरकार द्वारा राशि में बढ़ोतरी कर 75 हजार रुपए कर देने पर दलाली के भाव बढ़ गये हैं। राशि मिलने के समय 10 हजार रुपए देने हैं। कुल मिलाकर एक महादलित को 75 हजार रुपए में से 5000 रुपए देने पड़ते हैं। यहां के कुछ लोगों के पास पट्टा है, परन्तु कब्जा नहीं। कुछ का कब्जा है, परन्तु पट्टा नहीं मिला। पेयजल की विकराल समस्या है। 
हिलसा प्रखंड में कमता पंचायत और कमता गांव है। यहां प्रारंभ में ग्रामीण भूमिहीन नियोजन गारंटी कार्यक्रम के तहत मकान बनाया गया। अब बेहद खराब अवस्था में है। छत गिरने को है। 40 घरों में करीब 234 लोग रहने को बाध्य हैं। यहां आजतक कोई भी वंदा मैट्रिक नहीं कर सका है।
लाठी के सहारे चलने वाले बुजुर्ग चमारी मांझी कहते हैं कि सरकार ने गैर मजरूआ भूमि पर ग्रामीण भूमिहीन नियोजन गारंटी कार्यक्रम के तहत घर बनाने का आदेश दिया था। गैर मजरूआ भूमि का रकवा एक बीघा है। 1989 में 27 महादलितों को डेढ़-डेढ़ डिसमिल जमीन दी गयी। सभी के नाम से पर्चा निर्गत किया गया है। थाना संख्या 60 है। जब ठेकेदार मकान बनाने गये, तब गैर मजरूआ जमीन को हथियाने वालों ने ठेकेदार को खदेड़ दिया। ऐसी स्थिति में ठेकेदार दूसरी जगह मकान बनाकर चला गया। आज भी खाता संख्या 197 और खेसरा संख्या 2457 पर दबंग का कब्जा है। इन्दिरा आवास योजना से 10 लोगों का मकान बना है। अल्प राशि होने के कारण मकान अधूरा ही रह गया है।
यहां के संजय मांझी बताते हैं कि आरंभ में हम लोगों को दबंग मात्र 2 सेर चावल मजदूरी में देते थे। इसके विरूद्ध महादलित संगठित हुए। कुदाल और खुरपी टांगकर खेतों में काम करना बंद कर दिया। अहिंसात्मक आंदोलन का परिणाम यह निकला कि दबंग मालिकों ने सेर के बदले में किलो से मजदूरी देना शुरू किया। जब आदमी नहीं मिलता है, तो 2 किलो के बदले 3 किलो अनाज भी दिया जाता है। जरूरी कार्य निपटारा के लिए 5 किलो मजदूरी भी दी जाती है। दबंगों ने साजिश के तहत केवल 8 लोगों का ही जाॅबकार्ड बनवाया। 
कमता गांव के महादलितों ने बताया कि शुरू में खेत मालिकों के यहां 25 मुसहर हलावाहा का कार्य किया करते थे। उनको आठ कट्ठा खेत मिलता था। खाने में सत्तू दिया जाता था। 14 गाही में से 1 गाही धान दिया जाता था। काफी परिश्रम के बाद ही खेत मालिकों की चंगूल से महादलित निकल पाये हैं। कामता गांव में 350 बीघा जमीन गैर मजरूआ है। प्लाट संख्या 2457 बताया जाता है। 
जहानाबाद जिला नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहा है। यहां पंचायत भवन के ही बगल में मान्दे बिगहा मुसहरी है। यहां के महादलित मनरेगा में कार्य किये हैं, परन्तु उनको काम के बदले दाम नहीं मिल पाता है। ऐसे में आखिर कैसे मनरेगा को पटरी पर लाया जा सकता है। यह समझ से परे है। 
मान्दे बिगहा आदर्श ग्राम पंचायत के मुखिया तेजप्रताप सिंह का कहना है कि इस पंचायत में 17 गांव हैं। इनमें 10 राजस्व गांव हैं। 16 गांवों में महादलित और दलित रहते हैं। मुसहर, पासवान, पासी, चौधरी, नट आदि समुदाय के लोग हैं। सबसे अधिक खराब स्थिति मुसहरों की है। मान्दे बिगहा मुसहरी के धर्मेन्द्र मांझी का कहना है कि हमलोग 150 सालों से सड़क के किनारे रहते आ रहे हैं। यहां 24 मकान हैं। 22 लोगों को पीला कार्ड मिला है। कम ही लोगों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत जाॅबकार्ड मिला है। उसी तरह राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कुछ लोगों को ही स्मार्ट कार्ड निर्गत किया गया है। अभी तक प्रवेश मांझी और शिवलोचन मांझी ही यहां मैट्रिक उत्र्तीण हैं। दोनों टोला सेवक हैं। प्रवेश मांझी मान्दे बिगहा में और शिवलोचन मांझी सुखनंदन चक में टोला सेवक हैं। दोनों बच्चों को पढ़ाते हैं। 
प्रवेश मांझी कहते हैं कि यहां इन्दिरा आवास योजना के तहत मकान निर्माण करवाया गया है। किसी तरह से 10 मकान छत तक बन सका। 14 भवन अधूरा है। इन अधूरे मकान को पूरा करने के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा राशि दी जा रही है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव अमृतलाल मीणा के मुताबिक, 1 अप्रैल, 2004 से पूर्व इन्दिरा आवास योजना से लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों का अधूरा मकान निर्माण करवाने के लिए राशि दी जा रही है। अब अधूरे मकान को पूर्ण करवाने वाले दलाल काम के पीछे लग गये हैं। ज्ञात हो कि पूरे बिहार में इन्दिरा आवास योजना में खुलेआम दलाली चल रही है। अब तो 10 हजार रुपए तक लिये जा रहे हैं। सरकार की बेरूखी के कारण 200 की जनसंख्या पर मात्र 1 ही सरकारी चापाकल है यहां। रामविलास मांझी कहते हैं कि धनौती में हमलोग मनरेगा के तहत काम किये थे। पोखरा का काम मिला था। मजदूरी आजतक नहीं मिली। कई बार मजदूरी की मांग की गयी। वार्ड सदस्य काम करवाये थे। मेरे अलावा सोनमति देवी, युर्दाेधन मांझी, प्रभावती देवी आदि ने भी काम किया था। मजदूरी के लिए अब तो आंख पथरा गयी है।
भोजपुर में आज भी महादलित मुसहरों को गांव के किनारे ही रहना पड़ता है। यहां सरकारी बेरूखी के कारण मुसहर बंधुआ मजदूर बनने को बाध्य हैं। समूची मुसहरी में मालिकों का खौफ बरकरार है। ये महादलित डर से जुबान खोलना पसंद नहीं करते।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र भोजपुर के संदेश प्रखंड में डिहरा पंचायत है। यहीं धर्मपुर मुसहरी है। करीब 150 सालों से मुसहर यहां रहते हैं। 100 घरों में 600 की जनसंख्या में बाल-बच्चे और सयाने हैं। 80 बीपीएल श्रेणी में हैं। 40 लोगों को अंत्योदय श्रेणी में रखकर पीला कार्ड निर्गत किया गया है। 30 लोगों को जाॅबकार्ड निर्गत किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत 20 लोगों को स्मार्ट कार्ड निर्गत किया गया है। इस मुसहरी में इन्दिरा आवास योजना से निर्मित 100 मकानों में से 50 फीसदी अधूरा है। केवल अगहन मुसहर और शंकर मुसहर ही मैट्रिक पास कर सका है। 
इस क्षेत्र में मुसहरों को काम के बदले तीन सेर चावल मिलता है। उसके साथ सूखी रोटी मिलती है। दूसरे मजदूरों को 60 रुपए मिलते हैं। गांव के रईस नारायण सिंह हैं। उनके पास आज भी 100 बीघा का जोत है। यह कथन श्यामफूला देवी का है। वह बताती है कि इनके पति तुलसी मुसहर बंधुआ मजदूर हैं। नारायण सिंह के पास 20 वर्षों से बंधुआ मजदूरी करते हैं। मालिक एक बीघा जमीन दिये हैं। मालिक और अपना खेत हल से जोतते हैं। सुबह 8 से शाम 5 बजे तक मेहनत करते हैं। मालिक से 700 सौ रुपए लिये थे, अब ब्याज सहित बढ़कर 10 हजार रुपए हो गये हैं। यहां मालिकों का काफी खौफ है। सबकुछ जानते हुए भी लोग कुछ बताना नहीं चाहते। लोग नहीं चाहते कि मालिक और बंधुआ मजदूरों के बीच तनाव हो। श्यामफूला देवी कहती हैं कि भोजपुर की धरती रक्तरंजित होती रही है। अबतक काफी लोगों की जान जा चुकी है। सबसे अधिक खूनी खेल 1996 को में खेला गया। 
बांका भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। चांदन प्रखंड के धनुवसार पंचायत और लोहटनियां गांव में विकास नहीं हो सका है। इस समय धनुवसार ग्राम पंचायत की मुखिया विनीता देवी हैं। यहां जनप्रतिनिधि और नौकरशाहों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है। पिछले 200 साल में केवल दो लोग मैट्रिक की परीक्षा पास कर सके हैं। अभी 45 लड़के-लड़कियां विद्यालय जाते हैं। किसी को मुख्यमंत्री साइकिल योजना से लाभ नहीं मिला है। इसका मतलब कोई भी नौवीं कक्षा उत्र्तीण नहीं कर पाया है। 
यहां करीब 60 घर हैं। 50 को बीपीएल और 10 परिवारों को एपीएल में डाला गया है। 50 बीपीएल परिवारों में से केवल 3 लोगों को अंत्योदय में डालकर पीला कार्ड निर्गत किया गया। बाकी 47 परिवारों को बीपीएल लाल कार्ड निर्गत कर दिया गया। जनवितरण प्रणाली की दुकान से राशन में कटौती करके राशन दिया जाता है। इसका असर इन्दिरा आवास योजना पर भी पड़ा है। कम स्कोर वाले 10 लोगों को इन्दिरा आवास योजना से राशि मिली थी। इसमें 4 लोगों ने अपना पैसा मिलाकर किसी तरह मकान बनवा लिया। शेष 6 लोगों का मकान अधूरा ही रह गया। 
यहां के 50 नौजवान पलायन कर गये हैं। कोलकाता, मुम्बई, गुजरात, दिल्ली आदि जगहों में जाकर कार्य करते हैं। घर से दूर जाकर काम कर जो पैसे कमाते हैं, उससे दो मोबाइल खरीदते हैं। एक मोबाइल अपने परिजनों को घर पर दे देते हैं। दूसरा अपने पास रखते हैं। यहीं मोबाइल उनके लिए जी का जंजाल बन गया है। मोबाइल रखने वाले परिवारों को बीपीएल से निकालकर एपीएल में शामिल कर दिया जा रहा है। सर्वेयर कहते हैं कि इनके घरों में शौचालय नहीं है, परन्तु अधिकांश लोगों के पास मोबाइल है। 2 सरकारी चापाकल हैं। साथ ही सरकारी सुविधाओं का पर्याप्त लाभ यहां नहीं मिल पा रहा है।

यह है सरकारी आंकड़ों का खेल

अबतक राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा राज्य के 1,84,037 भूमिहीन परिवारों को तीन-तीन डिसमिल जमीन उपलब्ध कराया गया है। विभाग द्वारा पहले गैर मजरूआ, आम व अन्य सरकारी जमीन को आवासीय भूमिहीनों को आवास के लिए आवंटित किया गया। जहां सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं थी, वहां सामान्य जमीन को खरीदकर महादलित परिवारों को उपलब्ध कराने की योजना 2009-10 से राज्य में शुरू हुई है। प्रथम चरण में 1,99,047 परिवारों को वास भूमि उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। अभी 1,84,037 आवासहीनों को जमीन मिली है। इस तरह अभी बिहार में 15,010 ही आवसहीन बचे हैं, जिन्हें सरकार द्वारा 20 हजार रुपये प्रति परिवार को जमीन खरीदने के लिए देना है। 
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग का आंकड़ा सरकार को महिमामंडित करने वाला हो सकता है। मगर जनसंगठन एकता परिषद के कार्यकर्ताओं के गले यह बात नहीं उतर रही है। अभी हाल ही में एकता परिषद, बिहार द्वारा 35 हजार आवासीय भूमिहीनों का आवेदन अंचल कार्यालय में पेश किया गया है। ऐसे में किस आधार पर केवल 15,010 आवासहीन जमीन से वंचित हैं। बच्चू मांझी कहते हैं कि आगामी चुनाव के अवसर पर महादलितों के समाने आंकड़ा पेश करके महादलितों को मायावी जाल में फंसाने और भ्रमाने की साजिश की गयी है। 
आंकड़े पर नजर डालें तो अरवल में लक्ष्य 928 के विरूद्ध में 997, गया जिले में लक्ष्य 16471 के विरूद्ध 16474, औरंगाबाद जिले में लक्ष्य 2943 के विरूद्ध में 2943, नवादा जिले में लक्ष्य 6288 के विरूद्ध 6288 और जहानाबाद जिले में 3141 के विरूद्ध 2554 महादलित परिवारों को 3 डिसमिल जमीन दी गयी। इस तरह अरवल 107.44, गया 100.02, औरंगाबाद 100 और नवादा 100 फीसदी उपलब्धि देने वाले जिले हैं। इन चारों जिलों को मिलाने पर कुल लक्ष्य 26,630 था और 26,702 को जमीन आवंटित कर दी गई। ऐसे में इनका शानदार 103 प्रतिशत का आंकड़ा हो जाता है। और इस तरह सौ फीसदी उपलब्धि से भी अधिक का रिकाॅड बन गया है। वहीं जहानाबाद जिले में लक्ष्य 3,141 के विरूद्ध 2,554 महादलित परिवारों को 3 डिसमिल जमीन दी गयी। इसका 81.31 प्रतिशत होता है। जहानाबाद जिले का प्रतिशत लुढ़कने से अब मगध प्रमंडल के पांच जिलों का प्रतिशत 98.03 हो गया है। यह तो प्रथम चरण का हाल-ए-आंकड़ा है। इससे साफ जाहिर होता है कि द्वितीय चरण में जमीन पाने वालों की संख्या में और वृद्धि होगी।
लेखक परिचय : आलोक कुमार ने पटना विश्वविद्यालय से ग्रामीण प्रबंधन एवं कल्याण प्रशासन में डिप्लोमा किया है। ये पिछले कई वर्षों से समाजसेवी के रूप में कार्य कर रहे हैं। दलितों, महादलितों के बीच जाना, उनका दुख-दर्द सुनना और उसे दूर करने का प्रयास करना इनका कार्य है। खासकर मुसहर समुदायों के बीच ये काफी लोकप्रिय हैं।

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

जमसौत मुसहरी, दानापुर: एक आदर्श मुसहरी

MANOJ  KUMAR,  KBC
राजीव मणि
दानापुर से सटे पश्चिम की ओर एक मुसहरी है। नाम है जमसौत मुसहरी। करीब 110 घर हैं यहां। करीब 400 आबादी। पिछले ही साल यह मुसहरी अचानक चर्चा में आ गयी। कारण था, इसी मुसहरी का रहने वाला मनोज कुमार ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की हाॅट सीट तक जा पहुंचा। जगदेव पथ स्थित एक संस्था है शोषित समाधान केन्द्र। मनोज यहीं रहकर पढ़ाई कर रहा है। इस संस्था की खास बात यह है कि यह संस्था मुसहर लड़कों को निःशुल्क शिक्षा देती है। रहने-खाने की भी यहां व्यवस्था है। सारा कुछ निःशुल्क। इस संस्था में अभी करीब 300 मुसहर बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। मनोज संस्था की ओर से केबीसी में प्रतिनिधित्व कर रहा था। वहां से वह 25 लाख रुपए जीतकर लौटा। 
POONAM  KUMARI
जमसौत मुसहरी के साथ एक और उपलब्धि जुड़ने वाली है। इसी वर्ष आने वाले दिनों में यह फिर चर्चा में होगी। इस बार आठवीं वर्ग में पढ़ने वाली पूनम कुमारी की वजह से। पूनम ‘नारी गूंजन संस्था’ की छात्रा है। लालकोठी छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रही है। यहां मुसहर लड़कियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है। रहने-खाने की व्यवस्था के साथ। पूनम अपने स्कूल में शिक्षा पाने के साथ कराटे सीख रही है। और इसी माह वह अन्य 11 लड़कियों के साथ संस्था की ओर से इटली जाने वाली है। वहां वह इटली की लड़कियों के साथ कराटे का मुकाबला करेगी।
अन्य मुसहरी से काफी हटकर है यह। इसकी कई वजह हैं। सबसे बड़ा कारण है कि यहां के मुसहर देशी या महुआ दारू का कारोबार नहीं करते। दूसरी बात साफ-सफाई के मामले में यह मुसहरी काफी जागरूक है। यहां जाने पर किसी गांव में होने जैसा भ्रम दिखता है। कहीं से मुसहरी का कोई लक्षण नहीं। 
यहीं मुझे बिटेश्वर सौरभ मिलें। इसी मुसहरी में रहते हैं। पत्राचार से एम.ए. कर रहे हैं। इन्होंने बताया कि यहां के 15 बच्चे मैट्रिक पास कर चुके हैं। आठ बच्चे इण्टर और एक बीए है। मैं भी एम.ए. कर रहा हूं। बिटेश्वर सौरभ बिहार शिक्षा परियोजना में सहायक साधन सेवी हैं। 
बिटेश्वर बताते हैं कि यहां 110 में से 100 घर इंदिरा आवास योजना के तहत बने हैं। स्वास्थ्य कार्ड 65-70 लोगों के पास है। मनरेगा का यहां बुरा हाल है। सभी को काम नहीं मिल पाता है। 
ऐसा नहीं कि जमसौत मुसहरी की किस्मत में सिर्फ खुशियां ही खुशियां हैं। दर्द भी साफ देखने को मिला यहां। कुछ मजबूरी भी। सबसे बड़ी मजबूरी आर्थिक तंगी को लेकर है। वजह साफ है, पैसे के बिना सब सूना। कई घरों के लोग तो यहां दाने-दाने को भी मोहताज दिखे। बीमार पड़ने पर तो भगवान का ही सहारा होता है। बीमारी यहां की सबसे बड़ी समस्या दिखी। 
बताया गया कि बीमारी के कारण कई लोग इंदिरा आवास योजना से मिली राशि को खर्च कर लिए। इस कारण मकान आधा-अधूरा पड़ा है। कई घरों की छत ढलाई नहीं हो सकी है। लोग जैसे-तैसे जीवन गुजार रहे हैं। कई वृ़द्धों को वृद्धा पेंशन मिल रहा है। लेकिन, ढेर सारी समस्याओं के बीच मुट्ठी भर पैसा कहां समा जाता है, कुछ समझ में नहीं आता। केनारिक मांझी और उनकी पत्नी सकलबसिया देवी ऐसा ही कहती है। 
यहीं रमझडि़या से भी मुलाकात हो गयी। उम्र करीब 70 साल रही होगी। मुझे देखकर कोई सरकार का आदमी समझ बैठी। चिल्ला-चिल्ला कर अपनी जमीन दिखाने लगी। कहने लगी - छह साल पहले यहीं मेरा घर था। पुराना होकर गिर गया। मुखिया घर बनाने को पैसे नहीं देती। एकदम बेकार है वह। मुसहरों की बात कौन सुनेगा। अब आप आए हैं तो मेरा पास करवा ही दीजिए। किसी तरह उसे समझाया गया। भीड़ लग गयी। कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने मेरी बात उसे अपनी तरह से समझायी। तब जाकर वह शान्त हुई। 
इसी बीच गांव में पूजा की तैयारी होने लगी। पता चला कि आज यहां देवी की पूजा होगी। साल में एक बार की जाती है। खूब तामझाम हुआ। बीच गांव में मिट्टी से बनी देवी को एक तख्ती पर बैठाया गया। औरतें ढोलक लेकर आ गयीं। चारो ओर से पूजा स्थल पर घेरकर बैठ गयीं। देवी गीत गाने लगीं। भक्तिन भी पहुंच गयी। एक बुजुर्ग-सा आदमी वहीं कबूतर की बलि देता है। इसपर भक्तिन ने कहा - देवी प्रसन्न नहीं है। तब बकरे की बलि दी जाती है। देशी दारू भी चढ़ाया जाता है। भक्तिन झूमने लगी। मुझे लगा कि शायद देवी प्रसन्न हो रही है। मैं यहां किसी परंपरा या किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं चाहता था। थोड़ा-थोड़ा अंधकार हो चला था। अब जमसौत से पटना लौटने का वक्त था। 
लौटते-लौटते कई सवाल यूं ही रह गये। मन तो नहीं कर रहा था आने को, पर मजबूरी थी। मुझे अपना गांव याद आ रहा था। महादलित समुदाय के इन मुसहरों ने जैसे मुझे सम्मोहित कर दिया था। फिर मिलने की बात कह मैं वहां से विदा हुआ। 

एलसीटी घाट मुसहरी: शाम अस्त तो मुसहर मस्त

पटना के राजापुल के पास ही एक मुहल्ला है। नाम है एलसीटी घाट। यहीं यह मुसहरी है। एलसीटी घाट मुसहरी में करीब 36 घर हैं। इनमें 60 परिवार रहते हैं। कचरा से लोहा, प्लास्टिक, कागज आदि चुनना यहां के लोगों का मुख्य पेशा है। ये इन्हें कबाड़ी के यहां बेचते हैं। और इनसे मिले पैसों से ही इनका गुजारा चलता है। कुछ लोग अब मजदूरी भी करने लगे हैं। दोनों वक्त अगर इनके घर चुल्हा जल जाए तो समझा जा सकता है कि मुसहर ने आज खाने भर का कमा लिया है। बात साफ है। और कुछ लिखने लायक नहीं। 
इस मुसहरी की एक खास पहचान है। चारो ओर गंदगी और देशी दारू की महक। यहां मैं बदबूं शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहता। कारण कि 14-15 वर्षों से मैं इन्हें समझने के प्रयास में ऐसी जगहों पर जाता रहा हूं। अब तो आदत सी हो गयी है। लेकिन, एक चीज जो अच्छी नहीं लगती। यहां 6-7 दारू की दुकानें हैं। दिन-रात लोगों की भीड़ लगी रहती है। दो कबाड़ की दुकानें भी हैं। हल्की हवा से भी कागज-प्लास्टिक उड़कर आपके मुंह पर आ जाए तो कोई नयी बात नहीं। 
कुछ लोगों ने यहां सूअर भी पाल रखा है। इन्हें खाने के लिए। यहां के मुसहरों का चूहा या मेढक खाना कोई नयी बात नहीं है। जब खाने को लाले पड़ जाते हैं, तो ये ऐसा करते हैं। यहां जाने से पहले काफी कुछ की आदत डालनी होगी। 
बीमारी और उससे होने वाली मौतें तो जैसे इस मुसहरी की पहचान बन गयी है। पिछले 14-15 वर्षों में मैं अखबार के लिए यहां होने वाली सैकड़ों मौत की खबर लिख चुका हूं। अब तो कइयों के नाम तक याद नहीं। किस-किस के नाम याद रख पाता! मुझमें इतनी क्षमता नहीं। हां, अभी रामजी मांझी, राजेन्द्र मांझी, शंकर मांझी और कुछ अन्य लोग बीमार हैं। बताया गया कि इस साल पांच लोग मर चुके हैं। इनमें एक बच्चा भी था।
पूरी मुसहरी में दो चापाकल हैं। बीपीएल में कुछ ही लोगों का नाम जुड़ पाया है। आंगनबाड़ी केन्द्र भी है, लेकिन बच्चों के मन पर है कि वे पढ़ने जायें या नहीं। वैसे भी यहां पढ़ने-लिखने की बात कोई नहीं करता। सो मैं आपको सावधान करता हूं। 
यह मुसहरी उत्तरी मैनपुरा पंचायत के अंतर्गत आती है। पहले यहां के मुखिया थे रंजीत सिंह। इनकी हत्या के बाद इनके ही छोटे भाई पिछले चुनाव में मुखिया चुने गये। मुसहरों का कहना है कि रंजीत सिंह ने मुसहरों के लिए काफी काम किया था। अब उनके भाई सुधीर मुखिया तो यहां झांकने तक नहीं आते। मुसहरों को देखकर दूर से ही भगा देते हैं। 

लालू नगर मुसहरी: नाम बड़े और दर्शन छोटे

राजधानी पटना का कुर्जी-दीघा क्षेत्र पूरे बिहार में कई अच्छे मिशनरी स्कूलों के लिए जाना जाता है। यहां बालूपर रोड है। इसके पास ही है लालू नगर मुसहरी। कभी पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इस मुसहरी को बसाया था। यहां 16 घर बनवाये गये थे। सभी एक कमरे का। सभी घरों को अलग-अलग मुसहरों के नाम पर एलाॅट किया गया था। लालू प्रसाद खुद यहां आये थे मुसहरों को घर देने। 
आज यहां के कई घर सिर्फ नाम के घर रह गये हैं। कई टूट चुके हैं। कई रहने लायक नहीं रह गये। किसी तरह 15 परिवार यहां अब भी रह रहे हैं। इन मुसहरों का मुख्य पेशा है कचरा से कागज, प्लास्टिक, लोहा आदि चुनना। अब कुछ खेतों में भी काम करने लगे हैं। हां, यहां शराब बनायी या बेची नहीं जाती। लेकिन, पीने वाले कई हैं। दूसरी मुसहरी में इनका अड्डा लगता है। कई मुसहर कर्ज के बोझ तले दबे हैं। कोई ज्यादा कर्ज नहीं है। 4-5 हजार का ही है। लेकिन इन मुसहरों के लिए यह 4-5 हजार किसी 4-5 लाख रुपए जैसा है। 
पंचायत क्षेत्र में है यह मुसहरी। कई मुखिया आए-गये। काम को देखा जाए तो यहां पता ही नहीं चलता। एक कमरे का एक मकान यहां बनता दिख रहा है। पता चला कि इंदिरा आवास योजना के तहत बनाया जा रहा है। छोटन मांझी का मकान है यह। मुखिया का काफी नाम लेते हैं। चुनाव में काफी मदद किया था। 
अगर छोटन मांझी की बात छोड़ दी जाए तो हर कोई मुखिया को काफी भला-बुरा कहता है। सबको वृद्धा पेंशन नहीं। छोटन बीए पास है और एक फैक्ट्री में काम करता है। इसकी बेटियां सरकारी स्कूल में पढ़ रही हैं। भाई बी.एससी. का छात्र है। बाकी सभी लोग अंगूठा छाप। पढ़ाई से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। रोज कमाना, रोज खाना की तर्ज पर गुजर रही है जिन्दगी।

क्या खत्म हो जायेगी मिन्ता की चिन्ता

MINTA DEVI
राजीव मणि
यह कहानी है एक औरत की। एक ऐसी औरत की जो शादीशुदा होते हुए भी करीब साल भर विधवा की तरह रही। और फिर पहले पति के जिन्दा रहते, बिना तलाक के ही, दूसरे के साथ जबरन ब्याह दी गयी। इस औरत का नाम है मिन्ता देवी। 
मिन्ता देवी (22) जमसौत मुसहरी की रहने वाली है। सन् 2002 में मिन्ता की शादी मोहनचक निवासी कुणाल (23) से हुई थी। शादी के बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में रह रहे थे। इधर पिछले दो वर्षों से कुणाल का चक्कर यादव जाति की एक औरत के साथ चल रहा था। इसका नाम ममता है। ममता पहले से ही शादीशुदा है। मिन्ता बताती है कि ममता का पति ज्यादा उम्र का था। उसका हमारे घर काफी आना-जाना था। और गांव के रिस्ते से मजाक भी किया करती थी। 
अचानक कुणाल और ममता अपने-अपने घरों से भाग गये। बाद में पता चला कि दोनों भागकर पति-पत्नी की तरह कहीं रह रहे हैं। मिन्ता कुणाल को जब भी फोन कर पूछती, तो हमेशा वह लौट आने की बात करता, लेकिन आ नहीं रहा था। इधर यादव जाति के लोग इस घटना से बेहद नाराज हैं और उसे जान से मार देने को खोज रहे हैं। एक-दो बार वे मिन्ता के साथ मारपीट भी कर चुके हैं। 
देखते-देखते कई माह गुजर गये। मिन्ता के घर वाले अब मान चुके हैं कि कुणाल लौटकर नहीं आने वाला। ज्ञात हो कि शादी के 11 साल गुजर जाने के बाद भी मिन्ता मां नहीं बन सकी। 
अंततः हार कर मिन्ता के घर वालों ने मिन्ता की दूसरी शादी कर देने की ठान ली। अपनी विरादरी में ही लड़के की खोज होने लगी। और एक लड़का मिल ही गया। फूलवाड़ीशरीफ स्थित कुरकुरी का रहने वाला राजकुमार मांझी (35)। राजकुमार चार बच्चों का बाप है। नगर निगम में काम करता है। विधुर है। इसी नवरात्र में अष्टमी की रात मिन्ता की शादी राजकुमार से कर दी गयी। बिना किसी बाजे-गाजे के, बिना ताम-झाम के। हालांकि मिन्ता को शादी अपने परिवार वालों के दबाव में करनी पड़ी।
अबतक किसी मुसहरी से लड़की-औरत को लेकर भागने या उससे शादी रचाने की घटना देखी-सुनी जाती रही है। लेकिन, मुसहर द्वारा किसी दूसरी जाति की लड़की-औरत को लेकर भागने या उससे शादी रचाने की घटना कम ही सामने आयी है। अब ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों के बीच तनाव बना हुआ है।

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

पारंपरिक तरीके से मुसहरों ने की पूजा

MPT Video
जमसौत मुसहरी, दानापुर में मुसहरों ने पारंपरिक तरीके से मां की पूजा अर्चना की। मुसहर टोली के बीच में की गई पूजा में गांव के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। देवी को प्रसन्न करने के लिए एक कबूतर और एक बकरे की बलि दी गयी। दारू भी चढ़ाया गया। महिलाएं ढोलक की थाप पर देवी गीत गा रही थीं। भक्तिन भूत खेला रही थी। पूरा वातावरण एक विशेष भक्ति रस में डूबा था। यह तस्वीर यही की है।

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

विकास मित्र ही बन गया दलाल

न्यूज@ई-मेल
एकंगरसराय प्रखंड के गांव मण्डाच्छ में प्रेमचंद रविदास रहते हैं। वे मजदूरी करते हैं। सामाजिक कार्यों में भी दिलचस्पी रखते हैं। एकंगरसराय के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) से प्रेमचंद की बात हुई तो उन्होंने दलालों से किसी भी लेन-देन में सावधान रहने को कहा। प्रेमचंद की पत्नी महापति देवी को इंदिरा आवास से 50 हजार रुपए मिले हैं। साथ ही चम्पा देवी, पप्पू रविदास, राजेश रविदास, चुन्नी रविदास की पत्नी को भी राशि मिली है। विडम्बना यह है कि सरकार और ग्रामीणों के बीच ‘सेतू’ बनने वाला विकास मित्र ही दलाल निकल गया। लाभार्थी महापति देवी के पति प्रेमचंद रविदास ने बताया कि यहां के विकास मित्र प्रह्लाद रविदास राशि विमुक्त होने के पहले 6 हजार रुपए देने की मांग करने लगा। इसपर प्रेमचंद ने विकास मित्र से कहा कि बीडीओ साहब ने किसी को दलाली नहीं देने की बात कही है। इसपर विकास मित्र ने एक ही झटके में ऊपर से नीचे तक के लोगों को हमाम में नंगा कर दिया। उसने कहा कि सभी को दलाली में मिली राशि में से बंदरबांट करना पड़ता है। विकास मित्र के झांसे में प्रेमचंद नहीं पड़े। 
25 सितम्बर, 2013 को एक कार्यादेश जारी किया गया है। पत्रांक 1167 है। इसपर प्रखंड विकास पदाधिकारी का हस्ताक्षर है। इसके अनुसार, वित्तीय वर्ष 2013-14 के अन्तर्गत इंदिरा आवास का आवंटन करते हुए सहायता राशि की प्रथम किस्त पचास हजार रुपए आपके खाते में पहले ही भेजी जा चुकी है। इसी सहायता राशि से आपको इंदिरा आवास का कार्य, छत ढलाई एवं शौचालय का निर्माण पूर्ण करना है। इसके बाद ही दूसरी अर्थात् अंतिम किश्त की राशि विमुक्त की जाएगी। शौचालय निर्माण हेतु आपको अलग से 9100 रुपए मिलेंगे तथा आपको स्वयं 900 रुपए की व्यवस्था करनी होगी। इस प्रकार दस हजार रुपए की लागत से शौचालय का निर्माण कराना अनिवार्य है। अंतिम किस्त की राशि बीस हजार रुपए उसी स्थिति में विमुक्त की जाएगी, जब आपके द्वारा इंदिरा आवास योजना का निर्माण, छत ढलाई एवं शौचालय का निर्माण पूर्ण कर की गयी फोटोग्राफी की एक प्रति 30 नवम्बर, 2013 तक कार्यालय को उपलब्ध करा दी जाएगी। निर्धारित समय सीमा तक आवास का निर्माण, छत ढलाई एवं शौचालय का पूर्ण निर्माण नहीं किये जाने की स्थिति में सहायता राशि की वसूली हेतु कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 
प्रेमचंद का कहना है कि इंदिरा आवास योजना की राशि विमुक्त करते समय किसी तरह की जानकारी नहीं दी गयी थी। पहले 45 हजार रुपए में मकान निर्माण करना था। प्रथम किस्त में तीस हजार रुपए निर्गत किया जाता था। इस राशि से लिंटर तक मकान बना लेना था। द्वितीय किस्त में लिंटर से आगे और छत ढलाई कर देनी थी। अब तो पचास हजार रुपए में ही मकान और शौचालय निर्माण कर देना है। अब 50 हजार रुपए में ही पूरा मकान बना लेना है। जानकारी के अभाव में प्रेमचन्द ने 50 हजार रुपए से मकान बनवाने की सामग्री खरीद ली है। इस तरह बुरे फंस गये हैं। अब जेल जाने की नौबत आ गयी है। 
इधर, आगरा में एक आमसभा में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने घोषणा कर दी है कि बढ़ती महंगाई के आलोक में इंदिरा आवास योजना की राशि में बढ़ोतरी कर दी गयी हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में 75 हजार रुपए और गैर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में 70 हजार रुपए की राशि दी जाएगी। इसे 1 अप्रैल, 2013 से लागू कर दिया गया है। इसके बावजूद इस घोषणा का असर क्षेत्र में नहीं है। और तो और, अब 50 हजार रुपए में से 5 से लेकर 10 हजार रुपए तक दलालों को भी देने पड़ रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ इस गांव की नहीं, करीब-करीब पूरे सूबे के गांवों की है। लेकिन सरकार को इससे क्या, सिर्फ घोषणा कर देने और मीडिया में कवरेज मिल जाने भर से मतलब रह गया है। 

बिहार में ऐसे होता है सरकारी काम 

एक अन्य घटना में अंचलाधिकारी, एकंगरसराय कार्यालय, नालंदा के क्रियाकलाप को देखें। चालू वर्ष के मार्च माह में चार सौ से अधिक वासभूमि उपलब्ध कराने के लिए आवेदन दिये गये। अभी तक जांच पूरी नहीं की जा सकी है। इस बारे में सूचना के अधिकार के तहत आवेदन पत्र के साथ पोस्टल आर्डर संख्या 18 एफ-200404 दिनांक 23 जुलाई, 2013 को कार्यालय में जमा किया गया। प्रावधान के अनुसार, एक माह के अंदर आवेदक को सूचना उपलब्ध करा देना चाहिए। लेकिन, 17 सितम्बर, 2013 को पत्रांक 1519 के माध्यम से सूचना उपलब्ध करायी गयी। 
गैर सरकारी संस्था प्रगति ग्रामीण विकास समिति के नालंदा जिला समन्वयक चन्द्रशेखर सिंह ने चालू वर्ष के मार्च माह में वासभूमि उपलब्ध कराने हेतु चार सौ से अधिक आवेदन प्रपत्र अंचल कार्यालय में जमा कराया था। सूचना के अधिकार के तहत इसकी जानकारी मांगी गयी कि अबतक क्या कार्रवाई हुई है। लोक सूचना पदाधिकारी सह अंचलाधिकारी, एकंगरसराय, नालंदा ने देर से सूचना उपलब्ध करायी, जो इस प्रकार है - मार्च माह में प्रगति ग्रामीण विकास समिति के माध्यम से वासभूमि उपलब्ध कराने हेतु कुल 427 लोगों का विभिन्न पंचायतों से सूची प्राप्त हुई थी। राजस्व कर्मचारी, अंचल निरीक्षक से इसकी जांच करायी जा रही है। जांच प्रतिवेदन प्राप्ति के पश्चात वासभूमि उपलब्ध कराने की कार्रवाई की जायेगी। 

महादलितों की जमीन पर दबंगों का कब्जा 

अंचल कार्यालय, दानापुर से निर्गत एक सूची में 59 लोगों के नाम हैं। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने वर्ष 1986-87 में इन्हें जमीन की बंदोबस्ती की थी। बंदोबस्ती के बाद 43 लोग जमीन पर जा बसे। जिन 16 लोगों की बंदोबस्ती 1987-88 में की गयी थी, वे नहीं बस सके। बिन्द जाति के 43 लोग तो जमीन पर कब्जा करने में सफल रहे, शेष 16 महादलित मुसहर समुदाय के लोग इससे वंचित रह गये। इनकी जमीन पर दबंगों का कब्जा है। ये बेलीरोड-खगौल रोड के किनारे रहने को मजबूर हैं। अब ये यहां से कभी भी उजाड़ दिये जा सकते हैं। 
अंचल कार्यालय दानापुर, अनुमंडल दानापुर, पटना, मौजा-जलालपुर, थाना नं0 22, हल्का सं0 8, पंजी 2 में अंकित परवानाधारकों की सूची के अनुसार, कुल 59 लोगों के नाम से बंदोबस्ती की गयी थी। खाता 149, खेसरा 291 274, रकवा 0.02 डिसमिल है। सभी के नाम से जमाबंदी कर दी गयी है। 1701 से शुरू किया गया है। बंदोबस्ती केश नं0 1 बंटा 86-87 और 13/87-88 है। 
दबंगों ने मुसहरों को जमीन पर चढ़ने नहीं दिया। इन 16 लोगों को सिर्फ 13/87-88 का परवाना लेकर ही संतोष करना पड़ा। अब एकता परिषद के बैनर तले इन्हें जमीन पर कब्जा दिलवाने का प्रयास किया जा रहा है। 25 साल से 16 मुसहर परवाना पकड़कर बैठे हुए हैं। ये हैं तूफानी मांझी, रामा मांझी, बुन्देला मांझी, जामुन मांझी, चैतु मांझी, रामविलास मांझी, भाझी मांझी, धुरखेली मांझी, बहादुर मांझी, रामचन्द्र मांझी, सुखू मांझी, राजेन्द्र मांझी, रामजी मांझी, चन्द्रदीप मांझी, अमरीक मांझी और जामुन मांझी। इनमें कुछ लोगों के पास परवाना अब भी है। कुछ लोग इन 25 सालों में जमीन का परवाना संभाल कर नहीं रख सके।

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

मुसहर और महुआ दारू

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पश्चिम पटना में स्थित है दीघा मुसहरी। इसे शबरी कॉलोनी के नाम से भी जाना जाता है। यहां घर-घर में महुआ दारू बनाया जाता है। यहां अब यह धंधा कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। उत्पाद विभाग द्वारा लाख प्रयास किये जाने के बाद भी यह धंधा बंद नहीं हो पा रहा है। इसे मुसहरों ने आजीविका का मुख्य साधन बना लिया है। आरंभ में दीघा मुसहरी के ये महादलित खेतिहर मजदूर थे। दूसरे किसानों के खेत में ये मजदूरी किया करते थे। बाद में किसानों की खेती योग्य जमीन को बिहार राज्य आवास बोर्ड ने अधिग्रहण कर लिया। इस तरह खेत खत्म, तो मजदूरी भी खत्म। अब दीघा मुसहरी की महिलाएं और बच्चे कचरा से रद्दी कागज, प्लास्टिक, लोहा आदि चुनकर बेचते हैं। पुरुष दीघा आम के बगीचा में लकड़ी और ठेका पर काम करने लगे। किसी तरह से इन परिवारों का जीविका चलाने लगा। कुछ लोग पैसे होने पर महुआ और गुड़ खरीदकर महुआ दारू बनाने लगे। दारू का धंधा चल निकला। 
यहां आसानी से बाजार में महुआ और गुड़ मिल जाता है। दो किलो महुआ और एक किलो गुड़ की कीमत 170 रुपए है। इसी तरह 40 रुपए में पांच किलो लकड़ी मिलती है। खाना लकड़ी पर बने या न बने, मगर महुआ दारू लकड़ी पर ही बनाया जाता है। महुआ और गुड़ को पानी में डाल दिया जाता है। फिर मिट्टी के पात्र में रखकर पुलिस से बचाने के लिए जमीन में दबा दिया जाता है। करीब 10 दिनों तक महुआ और गुड़ को सड़ने दिया जाता है। उसके बाद निकालकर आग के ऊपर स्पेशल पात्र में डाल दिया जाता है। फिर साइफन पद्धति से भाप बनकर नली के सहारे नीचे रखे पात्र में दारू टपकना शुरू हो जाता है। एक-डेढ़ घंटे के अंदर महुआ दारू बन जाता है। बनने के बाद दारू गरम रहता है। जितना दारू उतना ही पानी डालकर दारू पीने लायक बनाया जाता है। एक बोतल दारू की कीमत 40 रुपए है। इस तरह लागत कीमत से दोगुना दाम मुसहरों को मिल जाता है। 
हालांकि जितना पुराना इतिहास मुसहरों का महुआ दारू के साथ है, उतना ही पुराना इससे होने वाली मौत का भी। अभी-अभी उर्मिला देवी नामक महिला की मौत यहां हो गयी। उसे सिरोसिस ऑफ लीवर हो गया था। इससे पहले महुआ दारू पीकर यक्ष्मा बीमारी की चपेट में आकर अनगिनत मुसहरों की मौत हो चुकी है। आज महुआ दारू का असर कुछ इस तरह है कि यहां महिलाएं व बड़े बच्चे भी इसे पीने लगे हैं। साथ ही आसपास के लोग भी यहां नियमित आने लगे हैं। सुबह-शाम का नजारा किसी भट्ठी सी होती है। पुलिस का इसी रास्ते आना-जाना होता है, मगर इन्हें इससे कोई फर्क नहीं मिलता। हां, नजराना समय पर मिल जाना चाहिए।

अनुसूचित जनजाति बनाम पिछड़ी जाति

झारखंड के पहाडि़या जाति को बिहार में खैरा जाति बनाकर आरक्षण सुविधा से वंचित कर दिया गया है। इस कारण बांका के 10 हजार पहाडि़या (खैरा) जाति के लोग आरक्षण से मिलने वाली सुविधाओं से अलग हो गये हैं। बिहार से झारखंड का बंटवारा 2000 को हुआ था। जो पहाडि़या जाति के लोग बंटवारे में झारखंड में रह गये, उनको अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त हो गया। बिहार में रह गये लोगों को नौकरशाहों ने खैरा जाति बनाकर पिछड़ी जाति के अंतर्गत रख दिया। एक जन जागरण गीत है - काहे देशवा में ऐसन कानून बबूआ...। अब बांका के पहाडि़या (खैरा) जाति के लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलवाने के लिए आंदोलन होने लगा है। अब देखना है कि सरकार क्या कदम उठाती है। 

महाबोधि मंदिर और गरीबों का दर्द

गया के महाबोधि मंदिर में आतंकी हमला के बाद अब वहां का नजारा काफी बदल सा गया है। मंदिर परिसर को किलानुमा दीवार से घेर दिया गया है। अब उस दीवार के बीच में दो जगहों पर गेट लगाने की बात हो रही है। साथ ही गेट पर द्वारपाल भी रखे जायेंगे। नियमित समय पर गेट को खोला और बंद किया जाएगा। इस दिषा में कार्य प्रगति पर है। सुरक्षा को देखते हुए यह जरूरी भी था। लोगों का कहना है कि सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था तो पहले से ही करनी चाहिए थी। 
दूसरा पक्ष यह है कि मंदिर के आसपास छोटी-छोटी दुकानें लगाने वाले सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गये हैं। इन्हें यहां से हटा दिया गया है। रूक की बत्ती, पीपल के पत्ते, कमल के फूल, सिक्का, सजावटी सामान, माला, अंगूठी, तस्वीर तथा अन्य छोटी-छोटी चीजें बेचने वाले लोग अब दो वक्त की रोटी के लिए भी सोचने को मजबूर हैं। क्या सरकार इनके बारे में भी कुछ विचार कर रही है ?

छलावा है भूमिहीनों को भूमि देने का आंकड़ा

आवासीय भूमिहीनों को सरकारी भूमि देने का आंकड़ा छलावा दिख रहा है। आज भी काफी संख्या में आवासीय भूमिहीन बोधगया में हैं। वहीं वनभूमि पर रहने वालों को वनाधिकार कानून 2006 के तहत लाभान्वित करने के बदले वन विभाग ने यहां रहने वालों पर मुकदमा कर दिया है। ज्ञात हो कि वनाधिकार कानून 2006 के तहत 13 दिसंबर, 2005 के पहले वनभूमि पर रहने वाले अनुसूचित जनजाति और तीन पुश्त से रहने वाले गैर अनुसूचित जनजाति के लोगों को वनभूमि का स्वामीत्व प्रदान करना है।
बिहार के गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड के गोबरियां नामक गांव के 42, बुमेर (टोला आमात्तरी) गांव के 40 और गुलरबंद गांव के 13 व्यक्तियों की जमीन पर कब्जा है। परन्तु, सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही के कारण जमीन का पर्चा निर्गत नहीं किया जा सका है। टोला आमात्तरी के 3 लोगों के पास जमीनी कागजात है, परन्तु दबंग व्यक्तियों का कब्जा है। मखदुमपुर में 7 व्यक्तियों के पास पर्चा है, परन्तु जमीन पर कब्जा नहीं। गुलरबंद जमीन पर कब्जा और पर्चा भी है, परन्तु 30 व्यक्तियों का दाखिल खारिज नहीं किया गया है। तिलैया काला में 20 व्यक्ति आवासहीन हैं। 15 लोगों के पास आवास है और उनको वासगीत पर्चा निर्गत नहीं किया गया है। सेवाई (टोला जहजवा) में 10 व्यक्ति आवासहीन हैं। 8 लोगों के पास आवास है, परन्तु वासगीत पर्चा नहीं दिया गया है। गोसाई पेसरा में 6 लोगों के आवास हैं, परन्तु वासगीत पर्चा निर्गत नहीं किया गया है। यहां के 10 लोगों के पास जमीनी कागजात है, परन्तु जमीन पर किसी और व्यक्ति का कब्जा है। बलचर में 9, चांदो में 12, करमा में 25 और रेवदा में 9 व्यक्ति आवासहीन हैं। कोहवरी के लोग वनभूमि पर रहते हैं। वनाधिकार कानून 2006 के तहत वनभूमि पर रहने वाले को मालिकाना हक देने का प्रावधान है। मगर मालिकाना हक देने के बदले वन विभाग ने 29 व्यक्तियों पर मुकदमा कर दिया है। 
इसी तरह मोहनपुर प्रखंड में सुगवां नामक गांव में 25, चोरनीमा में 15, सुखदेवचक में 31 और मुषरसब्दा में 20 लोगों का कब्जा जमीन पर है। परन्तु सरकार के द्वारा पर्चा निर्गत नहीं किया जा रहा है। वहीं सुखदेवचक के 19, वगुला के 10 और मुशरसब्दा के 50 व्यक्ति आवासहीन हैं। बताते चलें कि भूमि सुधार आयोग के पूर्व अध्यक्ष डी. बंधोपाध्याय ने अपनी अनुशंषा में सरकार को वासगीत पर्चा निर्गत करने के लिए शिविर लगाने को कहा था। इसी तरह आवासहीनों को 10 डिसमिल जमीन देने की बात कही गयी थी। इस समय 10 डिसमिल के बदले 3 डिसमिल जमीन आवासहीनों को दी जा रही है। 
पिछले दिनों पुअरेस्ट एरिया सिविल सोसायटी (पैक्स) के सहयोग से प्रगति ग्रामीण विकास समिति के बैनर तले गांव विकास यात्रा निकाली गयी। ये आंकड़े बाराचट्टी, मोहनपुर और बोधगया के प्रखंडों में यात्रा के दरम्यान संस्था को मिलें। बोधगया प्रखंड के 18 गांवों में गांव विकास यात्रा के दरम्यान 866 आवासहीनों की पहचान की गयी। 453 वासगीत पर्चा से महरूम हैं। साथ ही 242 ऐसे लोग हैं, जिनको सरकार ने पर्चा तो दे रखी है, लेकिन गांव के दबंगों का कब्जा है। 

उम्र का घनचक्कर 

गया जिले के बोधगया प्रखंड में मोचारिम पंचायत है। यहीं मोचारिम महादलित टोले में जुगेश्वर मांझी रहते हैं। खास बात यह है कि ये अपनी उम्र के चक्कर में फंस गये हैं। सुनकर यह अजीब भी लगेगा, लेकिन सच है। जुगेश्वर मांझी बताते हैं कि निर्वाचन आयोग के द्वारा जारी पहचान पत्र में बालेश्वर मांझी के पुत्र जुगेश्वर मांझी की उम्र 1.1.1995 को 35 साल दर्शाया गया है। पहचान पत्र की संख्या बीआर/43/253/204202 है। वहीं राज्य सरकार द्वारा जारी मनरेगा कार्ड में 55 साल लिखा गया है। खुद जुगेश्वर मांझी का कहना है कि वे 70 साल के हो गये हैं। उम्र के घनचक्कर में जुगेश्वर मांझी की तरह कई लोग उलझकर रह गए हैं। इस घनचक्कर में इनका कई काम फंसकर रह गया है। कारण कि सरकारी बाबू सही उम्र मानने को तैयार ही नहीं।

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

समाज के पथ प्रदर्शक थे चाणक्य

चाणक्य नीति
आज से करीब 2330 साल पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में चाणक्य का अहम योगदान रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य ने अर्जित अमूल्य ज्ञान को मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया। वर्तमान में सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियां और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के अध्याय से यहां प्रस्तुत हैं कुछ अंश: 
  • किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे ज्यादा काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।
  • अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
  • कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।
  • हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है।
  • अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।
  • दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे, मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंततः सुखी रहते हैं।
  • ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
  • नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।
  • जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।
  • असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
  • संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।
  • भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।
  • कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।
  • जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
  • झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालांकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
  • भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
  • जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।
  • वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।
  • जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।
  • जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है, उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र पर भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अतः सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
  • व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
  • मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है, क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
  • बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएं, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो, क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
  • वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है, जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षाविहीन मनुष्य बिना पूंछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें, जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
  • अधिक लाड़-प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं, तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डांटना भी आवश्यक है।
  • मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
  • जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
  • नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियां बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
  • जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुंह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है, तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहां से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है, तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
  • बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुंचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
  • मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

भारत के पुनरुत्थान में स्वामी विवेकानन्द का योगदान

सूक्तियां एवं सुभाषित
ये ‘सूक्तियां एवं सुभाषित’ अद्वैत आश्रम, मायावती द्वारा प्रकाशित ‘विवेकानन्द साहित्य’ से संकलित किये गये हैं। धर्म, संस्कृति, समाज, शिक्षा, सभी महत्वपूर्ण विषयों से संबंधित ये मौलिक विचार जीवन को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। स्वामी विवेकान्द ने भारत के पुनरुत्थान तथा विश्व के उद्धार के लिए जो महान कार्य किया, वह सभी को विदित है। रामकृष्ण मठ, नागपुर ने ‘सूक्तियां एवं सुभाषित’ नामक संग्रह प्रकाशित किया है। पेश है कुछ अंश:
  • विश्व है परमात्मा का व्यक्त रूप।
  • जब तक तुम स्वयं अपने में विश्वास नहीं करते, परमात्मा में तुम विश्वास नहीं कर सकते।
  • धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है।
  • यह मानना कि मन ही सब कुछ है, विचार ही सब कुछ है - केवल एक प्रकार का उच्चतर भौतिकतावाद है।
  • यह दुनिया एक व्यायामशाला है, जहां हम अपने आपको बलवान बनाने के लिए आते हैं।
  • जैसे तुम पौधे को उगा नहीं सकते, वैसे ही तुम बच्चे को सिखा नहीं सकते। जो कुछ तुम कर सकते हो, वह केवल नकारात्मक पक्ष में है - तुम केवल सहायता दे सकते हो। वह तो एक आन्तरिक अभिव्यंजना है, वह अपना स्वभाव स्वयं विकसित करता है - तुम केवल बाधाओं को दूर कर सकते हो।
  • एक पन्थ बनाते ही तुम विश्वबन्धुता के विरुद्ध हो जाते हो। जो सच्ची विश्वबन्धुता की भावना रखते हैं, वे अधिक बोलते नहीं, उनके कर्म ही स्वयं जोर से बोलते हैं।
  • सत्य हजार ढंग से कहा जा सकता है, और फिर भी हर ढंग सच हो सकता है।
  • तुमको अंदर से बाहर विकसित होना है। कोई तुमको न सिखा सकता है, न आध्यात्मिक बना सकता है। तुम्हारी आत्मा के सिवा और कोई गुरु नहीं है।
  • यदि एक अनन्त श्रृंखला में कुछ कडि़यां समझायी जा सकती हैं, तो उसी पद्धति से सब समझायी जा सकती है।
  • जे मनुष्य किसी भौतिक वस्तु से विचलित नहीं होता, उसने अमरता पा ली।
  • सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है, पर सत्य को किसी भी चीज के लिए छोड़ा नहीं जा सकता, उसकी बलि नहीं दी जा सकती।
  • सत्य का अन्वेषण शक्ति की अभिव्यक्ति है - वह कमजोर, अंध लागों का अंधेरे में टटोलना नहीं है।
  • ईश्वर मनुष्य बना, मनुष्य भी फिर से ईश्वर बनेगा।
  • यह एक बच्चों की-सी बात है कि मनुष्य मरता है और स्वर्ग में जाता है। हम कभी न आते हैं, न जाते। हम जहां हैं, वहीं रहते हैं। सारी आत्माएं, जो हो चुकी हैं, अब हैं और आगे होंगी, वे सब ज्यामिति के एक बिन्दु पर स्थित हैं। 
  • कोई भी किसी धर्म में जन्म नहीं लेता, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति धर्म के लिए जन्म लेता है।
  • यदि मैं एक मिट्टी के ढेले को पूर्णतया जान लूं, तो सारी मिट्टी को जान लूंगा। यह है सिद्धान्तों का ज्ञान, लेकिन उनका समायोजन अलग-अलग होता है। जब तुम स्वयं को जान लोगे, तो सब कुछ जान लोगे।
  • हम कभी निम्नस्तरीय पशु थे। हम समझते हैं कि वे हमसे कुछ भिन्न वस्तु हैं। मैं देखता हूं, पश्चिम वाले कहते हैं, ‘दुनिया हमारे लिए बनी है।’ यदि चीते पुस्तकें लिख सकते, तो वे यही कहते कि मनुष्य उनके लिए बना है और मनुष्य सब से पापी प्राणी है, क्योंकि वह उनकी पकड़ में सहज नहीं आता। आज जो कीड़ा तुम्हारे पैरों के नीचे रेंग रहा है, वह आगे होनेवाला ईश्वर है।
  • एक बार स्वामीजी किसी की बहुत प्रशंसा कर रहे थे। इस पर उनके पास बैठे हुए किसी ने कहा, ‘‘लेकिन वे आपको नहीं मानते’’ - इसे सुनकर स्वामीजी ने तत्काल उत्तर दिया - ‘‘क्या ऐसा कोई कानूनी शपथ-पत्र लिखा हुआ है कि उन्हें मेरी हर बात माननी ही चाहिए ? वे अच्छा काम कर रहे हैं और इसलिए प्रशंसा के पात्र हैं।’’
  • अगर कुछ बुरा करना चाहो, तो वह अपने से बड़ों के सामने करो।
  • जब तक भौतिकता नहीं जाती, तब तक आध्यात्मिकता तक नहीं पहुंचा जा सकता।
  • बहता पानी और रमता जोगी ही शुद्ध रहते हैं। 
  • हिंदू संस्कृति आध्यात्मिकता की अमर आधारशिला पर आधारित है। 
  • पक्षपात सब बुराइयों की जड़ है। 
  • भय ही पतन और पाप का निश्चित कारण है। 
  • ज्ञानी कभी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, सम्मान और स्वायत्तता को भंग नहीं करता है। 
  • आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी तथा उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता है। 
  • मन की दुर्बलता से अधिक भयंकर और कोई पाप नहीं है। 
  • आपदा ही एक ऐसी स्थिति है, जो हमारे जीवन की गहराइयों में अन्तर्दृष्टि पैदा करती है। 
  • हम भारतीय सभी धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार भी करते हैं। 
  • महान त्याग से ही महान कार्य सम्भव है। 
  • वस्तुएं बल से छीनी या धन से खरीदी जा सकती हैं, किंतु ज्ञान केवल अध्ययन से ही प्राप्त हो सकता है। 
  • जितना अध्ययन करते हैं, उतना ही हमें अपने अज्ञान का आभास होता जाता है। 
  • जिसके साथ श्रेष्ठ विचार रहते हैं, वह कभी भी अकेला नहीं रह सकता। 
  • वह नास्तिक है, जो अपने आप में विश्वास नहीं रखता। 
  • हम ईश्वर को कहां पा सकते हैं अगर हम उसे अपने आप में और अन्य जीवों में नहीं देखते ? 
  • आप को अपने भीतर से ही विकास करना होता है। कोई आपको सीखा नहीं सकता, कोई आपको आध्यात्मिक नहीं बना सकता। आपको सिखाने वाला और कोई नहीं, सिर्फ आपकी आत्मा ही है। 
  • आप ईश्वर में तब तक विश्वास नहीं कर पाएंगे, जब तक आप अपने आप में विश्वास नहीं करते। 
  • जागें, उठें और न रुकें जब तक लक्ष्य तक न पहुंच जाएं। 
  • हमारे व्यक्तित्व की उत्पत्ति हमारे विचारों में है, इसलिए ध्यान रखें कि आप क्या विचारते हैं। शब्द गौण हैं, विचार मुख्य हैं और उनका असर दूर तक होता है।

शनिवार, 28 सितंबर 2013

बापू ने कहा था

भाग एक
नव भारत के निर्माण में महात्मा गांधी के योगदान को उनके भाषण से समझा जा सकता है। अहिंसा के बल पर उन्होंने जो आन्दोलन चलाया, आगे चलकर उसने पूरे विश्व को एक नई दिशा दी। उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ अपना आन्दोलन चलाया, बल्कि एक स्वस्थ भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दरअसल बापू भारत में पैठ जमा चुके ऊंच-नीच, छुआछूत और जाति, वर्गों में बंट रहे समाज को लेकर भी काफी चिंतित थे। उनके भाषणों से यह साफ दिखता है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, उत्तर प्रदेश ने एक किताब प्रकाशित किया है। इस पुस्तक का नाम है ‘उत्तर प्रदेश में गांधी जी’। इसके लेखक हैं श्रीरामनाथ ‘सुमन’। बापू के भाषणों के अंश यहां इसी पुस्तक से दिए जा रहे हैं। आशा है, पाठक इससे लाभान्वित हो सकेंगे। 
1934 में भारत के विभिन्न प्रान्तों में अस्पृश्यता निवारण कार्य के लिए दौरा करने के बाद गांधीजी उत्तर प्रदेश, तब संयुक्त प्रान्त, में आये और 22 जुलाई से 2 अगस्त तक उन्होंने प्रमुख स्थानों और नगरों का दौरा किया। बापू की यात्रा के कुछ अंश यहां दिये जा रहे हैं। 
22 जुलाई को कानपुर नगरपालिका और जिला बोर्ड ने एक ही जगह अपने-अपने मानपत्र गांधीजी को दिये। ये मानपत्र भी डाॅ. जवाहरलाल रोहतगी के बंगले पर, जहां गांधीजी ठहराये गये थे, दिये गये। नगरपालिका की विवरणी से ज्ञात हुआ कि उन्होंने प्रशंसनीय हरिजन सेवा की है। 1932 के पूर्व ही उसने पन्द्रह हजार रुपए खर्च करके हरिजन कर्मचारियों के लिए कुछ मकान बनवा दिये थे। बा. ब्रजेन्द्रस्वरूप के अध्यक्ष चुने जाने के बाद से इस दिशा में और भी प्रगति हुई। एक साल के अंदर ही नगरपालिका ने 48,000 रुपए मूल्य के 188 अच्छे हवादार और साफ-सुथरे मकानों की व्यवस्था अपने हरिजन कर्मचारियों के लिए कर दी। 
कानपुर की जिला परिषद् ने यह निश्चय किया कि अन्य जाति के विद्यार्थियों की तरह हरिजन विद्यार्थी भी परिषद् के स्कूलों में भरती किये जाए और जो अध्यापक इस निश्चय के विरूद्ध जाएं, उन्हें अर्थदंड दिया जाए। प्राइमरी पाठशालाओं में हरिजन लड़कों से कोई फीस नहीं ली जाती। लड़कियों को सूत कातना सिखाया जाता है। 
जिला परिषद् की कन्याशालाओं में सूत कताई सिखाने की चर्चा करते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘खादी में मेरा आज भी वैसा ही अटल विश्वास है। हरिजनों से तो खादी का बहुत अधिक संबंध है। सैकड़ों-हजारों हरिजन स्त्रियों और जुलाहों की इससे सेवा हो रही है। कातने या बुनने का काम अगर हम इन्हें न देते, तो ये भूखों मर जाते, क्योंकि अन्य धंधों के रास्ते तो उनके लिए बिल्कुल ही बंद हैं। इसी तरह खादी से कितने ही मुसलमानों का भी काम चल रहा है। ...हजारों अधभूखे भारतीयों की कुछ न कुछ सहायता तो चरखा कर ही रहा है। दरिद्रनारायण की सेवा बिना खादी के हो ही नहीं सकती। ...’’
22 जुलाई को सार्वजनिक सभा हुई। इसमें गांधीजी को नागरिकों की ओर से मानपत्र और ग्यारह हजार की थैली भेंट की गयी। गांधीजी ने इस अवसर पर भाषण करते हुए कहा - ‘‘आपने मुझे जो यह 11,000 रुपए की थैली दी है, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। ...कानपुर में कुछ लोग ऐसे हैं, जो मेरी हरिजन प्रवृति को पाप कार्य समझते हैं। इनकी ओर से जनता में बहुत से पर्चे बांटे गये हैं जो सरासर असत्य से भरे हुए हैं। बड़े दुख की बात है कि सनातन धर्म के नाम पर मिथ्या बातों का प्रचार किया जा रहा है। मैं सनातनियों से प्रार्थना करता हूं कि वे मिथ्या प्रचार की इस हीन प्रवृति को रोकें।’’ 
‘‘आपने यदि इस हरिजन प्रवृति का महत्व समझा होता, तो मुझे हजारों की जगह लाखों रुपए दिये होते। परन्तु धन तो अस्पृश्यता का अंत नहीं कर सकता। वह तो तभी हो सकता है, जब सवर्ण हिन्दुओं के हृदय पिघल जाए। दाताओं ने यदि अनुभव कर लिया है कि अस्पृश्यता धर्म पर कलंक है, तो उनके दान का महत्व सैकड़ों गुना बढ़ जाता है। यह तो आत्मा शुद्धि की प्रवृति है। संख्या से इस प्रवृति का कोई संबंध नहीं। ...धर्म के नाम पर अपने पांच करोड़ भाइयों के प्रति हम जो अत्याचार कर रहे हैं, उसके लिए यदि दुनिया हमारे धर्म से घृणा करे तो यह उचित ही है। यदि कोई शुद्ध रीति से शास्त्रों को, गीता को और वेदों को पढ़े, तो उस धर्मग्रन्थों में उसे कहीं अस्पृश्यता नहीं मिलेगी। आज तो हम हिन्दू धर्म को भूल बैठे हैं।’’ 
‘‘...काली झंडियां दिखानेवालों का मुझे उतना ही ख्याल है, जितना सुधारकों का ...पर सत्य के अनुकूल आचरण करना मैं अपना धर्म समझता हूं। धर्म को कैसे छोड़ दूं ? ईश्वर क्या कहेगा ? सवर्ण हिन्दू मेरा निरादर करें, मुझ पर पत्थर फेंके या बम या रिवाल्वर चलावें, ऐसी बातों से मैं डिगने का नहीं। ...जो सनातनी धर्म का इजारा लेकर बैठ गये हैं, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि जिन शास्त्रों को वे मानते हैं, मैं भी उन्हीं को मानता हूं, परन्तु हमारा मतभेद तो शास्त्रों का अर्थ लगाने में है।’’ 
‘‘...हरिजन आन्दोलन ऊंच-नीच के भाव तक ही सीमित है, रोटी-बेटी संबंध से इसका कोई वास्ता नहीं। ...मंदिर प्रवेश के विषय में यह बात है कि जब तक किसी मंदिर में पूजा करने वाले सवर्ण हिन्दुओं का काफी बहुमत उसके पक्ष में न हो, तब तक वह हरिजनों के लिए न खोला जाए। मंदिर तो हमारे प्रायश्चित स्वरूप ही खुलने चाहिए...।’’ 
24 जुलाई को कानपुर में तिलक हाॅल का उद्घाटन करते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘...जब मैं पहली बार कानपुर आया था, तब मेरी यहां किसी से जान-पहचान नहीं थी। कानपुर आकर मैं गणेश शंकर विद्यार्थी को कैसे भूल सकता हूं ? उन्होंने ही मुझे अपने यहां टिकाया था। उस समय किसी और में यह हिम्मत नहीं थी। ...सद्भावना से तिलक महाराज भी उसी दिन इस नगर में आये थे। उनको उस जमाने में अपने घर टिकाना आसान काम न था। निर्भीक युवक गणेश शंकर से ही वह संभव था। इस नगर के साथ उनकी स्मृति हमारे हृदय में जुड़ी हुई है। ...उन्होंने वीर मृत्यु पायी। उनको इस अवसर पर मैं कैसे भूल सकता हूं ?’’ 
‘‘...तिलक महाराज ने अपना सारा ही जीवन भारत की उन्नति के लिए दे दिया। ...यदि वह हिन्दू धर्म को नहीं जानते थे, तो उसे कोई नहीं जानता। ...परन्तु उन्होंने कभी ख्याल नहीं किया कि हम उच्च हैं और वे नीच हैं। उनके साथ मैंने इस विषय पर काफी बहस की थी। ...उनकी विद्वता, उनकी आत्मशुद्धि और उनका संयम तो जब तक हिन्दुस्तान जीवित रहेगा, सारी दुनिया में अमर रहेगा। ...तिलक महाराज का यह स्मारक अमर रहे, ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है।’’ 
24 जुलाई को कानपुर में प्रान्त के विविध स्थानों से आये हरिजन कार्यकर्ताओं को लगभग तीन घंटे का समय गांधीजी ने दिया और कार्य करने की पद्धति तथा उनकी कठिनाइयों के संबंध में उन्हें उपयुक्त परामर्श दिया। 
शाम को विद्यार्थियों एवं हरिजनों की एक संयुक्त सभा में भाषण करते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘...यदि हिन्दुस्तान के विद्यार्थी अपने अवकाश का समय हरिजन सेवा में लगा दें, तो अस्पृश्यता निवारण की गति दस गुनी तेज हो जाए। अपने भाइयों की सेवा करना ही तो शिक्षा का श्रेष्ठ अंश है।’’ मेहतरों के मानपत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा - ‘‘आप लोग समाज की जो सेवा करते हैं, वह एक पवित्र धंधा है। जो आपसे घृणा करते हैं, अधर्म करते हैं, पर आप भी शौचादि के नियमों का पालन करें, मुर्दार मांस खाना छोड़ दें, दारू पीना और जुआ खेलना छोड़ दें।’’ 
गंधीजी ने लगातार दो दिनों तक कानपुर नगर की हरिजन बस्तियों का निरीक्षण किया। उन्होंने फाब्र्स कंपाउण्ड, विपत खटिक का हाता, लक्ष्मीपुरवा, हड्डी गोदाम, मीरपुर, मोतीमहल, बैरहना, केटल बैरक और ग्वालटोली की बस्तियों को बड़े ध्यान से देखा और वहां रहनेवाले हरिजनों से पूछताछ की। लक्ष्मीपुरवा, हड्डी गोदाम, बैरहना और ग्वालटोली की बस्तियों की दुर्दशा देखकर उन्हें बड़ा क्लेश हुआ और उन्होंने इनमें तुरन्त सुधार किये जाने की आवश्यकता की ओर नागरिकों तथा म्युनिस्पल अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया।
25 जुलाई को सुबह कुछ घंटे गांधीजी ने लखनऊ में बिताये। यहां उन्होंने दो भाषण दिये। पहले महिलाओं की सभा में, बाद में सार्वजनिक सभा में। सनातनियों का एक मानपत्र भी उन्होंने स्वीकार किया। इन सभी सभाओं में उन्होंने यही कहा कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर लगा हुआ महान कलंक और मनुष्यता के विरूद्ध अपराध है तथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ही यह आवश्यक है कि हम अपनी त्रुटियों का सुधार करें और प्रायश्चित भावना से हरिजन भाइयों को गले लगायें। 
गंधीजी 27 जुलाई को कानपुर से काशी आ गये। इस पवित्र पुरी में ही आत्मशुद्धि के इस प्रवास यज्ञ की पूर्णाहुति वह करना चाहते थे। पर शुरू के कई दिन अन्य कार्यो में ही निकल गये। 29 जुलाई को अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ की बैठक में वह जरूर शामिल हुए और संघ के आय-व्यय, उसके प्रबंधन कार्य और हरिजन सेवकों के लिए एक प्रशिक्षण संस्था स्थापित करने की आवश्यकता पर एक घंटे से भी ज्यादा बोले। 
28-29 जुलाई को काशी विद्यापीठ में हरिजन सेवक संघ के केन्द्रीय बोर्ड की बैठक हुई थी। 29 जुलाई को बैठक के अंत में सदस्यों को संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘दो प्रश्न हैं जिनके संबंध में मुझे आप लोगों से कुछ कहना है- एक तो यह कि संघ का गठन किस प्रकार का हो, दूसरे एक ऐसी प्रशिक्षण संस्था, जिसमें सदस्य या कार्यकर्ता हरिजन सेवा की शिक्षा पा सकें। ...मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि चुनाव या जनतंत्र जैसी किसी चीज के लिए हमारे संघ में स्थान नहीं है। हमारी संस्था तो एक भिन्न प्रकार की है। मामूली अर्थ में वह कोई लोक संस्था नहीं है। हम तो एक प्रकार के ट्रस्टी हैं, जिन्हें हमने अपने आप नियुक्त कर रखा है। पैसा केवल ट्रस्टी के रूप में हम अपने पास रखते हैं और केवल हरिजनों के हितार्थ उसका उपयोग करते हैं और इस ढंग से कि वह सीधे हरिजनों की जेब में जाए। हमारे संघ का संगठन इस विचार को सामने रखकर हुआ है कि जिन भाइयों को हमने सदियों से तुच्छ मान रखा है, उनके प्रति हम अपना कर्तव्य पालन करें। ...कुछ लोग कहते हैं कि प्रबंध कार्य में पैसा देने वालों की भी आवाज होनी चाहिए। मेरी राय में वे भूलते हैं। मेरी दृष्टि में तो एक पाई देनेवाला और दस से पचास हजार तक देनेवाला ...समान दाता है। ...घनश्यामदास के दस हजार रुपयों से भी उस एक पाई की कीमत स्यात अधिक हो। उड़ीसा में मैंने खुद अपनी आंखों देखा है कि वहां के गरीब आदमी किस प्रकार अपने फटे-पुराने चीथड़ों की गांठ में बड़े जतन से बंधे हुए पैसे-पाई को बड़े प्रेम से हमारी झोली में डालते थे। हजारों रुपयों की अपेक्षा ...मुझे तो गरीब की गांठ की वह कौड़ी ही पाकर अधिक आशा और प्रसन्नता हुई है। आत्मशुद्धि के इस यज्ञ में गरीब की कौड़ी के बिना हजारों की थैलियां किसी अर्थ की नहीं। किन्तु आपके उस जनतंत्र में उन हजारों गरीबों को तो वोट मिलेगा नहीं, प्रबंध में उन बेचारों की तो आवाज होगी नहीं। हम उनके नाम तक तो जानते नहीं। फिर भी हमारी उनके प्रति उतनी ही या उससे भी अधिक जवाबदेही है, जितनी हजारों की थैलियां देनेवाले बड़े-बड़े धनियों के प्रति। हमारी तो यह एक दातव्य संस्था है, जिसका अस्तित्व प्रामाणिक और योग्य प्रबंध पर निर्भर करता है। ...मेरे लिए तो यह विशुद्ध सेवा और प्रायश्चित का ही आन्दोलन है। ...’’ 
इसके बाद गांधीजी ने आजीवन हरिजन सेवा करनेवालों का महत्व बताते हुए उनके लिए दक्षिण अफ्रीका के ट्रेपिस्ट मिशन जैसी कोई शिक्षण संस्था बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। 
31 जुलाई को गांधीजी विविध हरिजन शिक्षणशालाओं के लगभग 500 बच्चों से मिले। उन्होंने कहा - ‘‘बच्चों को देखकर हमें संतोष नहीं हुआ। वे ठीक तरह से साफ-सुथरे नहीं रखे जाते। हरिजन पाठशालाओं के शिक्षकों को सबसे पहले तो सफाई पर ही ध्यान देना चाहिए। स्वच्छता ही तो धर्म का सार है।’’ 
31 जुलाई को सार्वजनिक सभा हुई। सभा कई दृष्टियों से अपूर्व थी। गांधीजी के विरूद्ध जहर उगलनेवाले बड़े ही गंदे पर्चे बांटे गये थे। आशंका थी कि सभा में कहीं कोई अनिष्ट न हो, परन्तु सब आशंकाएं निर्मूल निकलीं। सभा बड़े शान्त वातावरण में हुई। काशी के विद्वान पंडितों के मंडल ने भी गांधीजी को एक मानपत्र भेंट किया। एक विशेष आनंद की बात यह थी कि वर्णाश्रम स्वराज्य संघ तथा भारत धर्म महामंडल के प्रतिनिधि स्वरूप पं. देवनायकाचार्य जी को मुख्य शिकायत मंदिर प्रवेश बिल के संबंध में थी। उनके बाद मालवीयजी महाराज ने अस्पृश्यता निवारण के समर्थन में संक्षिप्त किन्तु जोरदार भाषण दिया तथा शास्त्रों से अनेक प्रमाण देते हुए यह सिद्ध किया कि हरिजनों को भी अन्य हिन्दुओं की तरह समस्त सामाजिक और धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए। इस सभा में भाषण देते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘...हरिजन आन्दोलन धार्मिक आन्दोलन है। इसमें दुराग्रह को स्थान नहीं है। मैं कितना ही जतन क्यों न करूं, मुझसे भी गलतियां हो सकती हैं और हुई भी हैं। ...जिस रूप में अस्पृश्यता इस समय मौजूद है, उसके लिए शास्त्र में स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर कलंक है। ...जलाशय पर एक कुत्ता भले ही चला जाए, परन्तु प्यासा हरिजन बालक वहां नहीं जा सकता। यदि गया तो मार खाने से बच नहीं सकता। इस समय की अस्पृश्यता मनुष्य को कुत्ते से भी हीन मानती है। ...ऐसी अस्पृश्यता को शास्त्र सम्मत न मेरी बुद्धि मान सकती है, न मेरा हृदय। ...काशी के पंडितों की ओर से मुझे जो स्वागत पत्र मिला है, उसके लिए मैं आभार मानता हूं। उसे मैं आप लोगों का आशिर्वाद समझता हूं।’’ 
1 अगस्त को हिन्दू विश्वविद्यालय की सभा में भाषण करते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘हिन्दू विश्वविद्यालय मेरे लिए कोई नयी वस्तु नहीं है। जब से यह आरंभ हुआ, तभी से मालवीयजी महाराज ने मेरा संबंध उससे बांध दिया है और आजतक वैसा ही बना हुआ है। ...मुझे आशा है कि विद्यार्थी लोग विद्या प्राप्त करके उसका सद्व्यय करेंगे और संकुचित अर्थ में धर्म को ग्रहण नहीं करेंगे।’’ इसके बाद आचार्य ध्रुव के अनुरोध पर गीता द्वारा अपने जीवन पर पड़े प्रभावों का उन्होंने उल्लेख किया। 
2 अगस्त को हरिश्चन्द्र हाई स्कूल में जुड़ी महिलाओं की सभा में भाषण करते हुए गांधीजी बोले - ‘‘...हिन्दू धर्म में बहुत दिनों से छुआछूत का भूत दाखिल हो गया है, जिससे दया और धर्म प्रतिदिन क्षीण होते जा रहे हैं। हम सब एक ही ईश्वर के बनाये हैं। तब कोई उनमें भेद-भाव कैसे कर सकता है ? ...शास्त्र यही समझता है कि सबसे महान यज्ञ इस जगत में सत्य है। आप माताओं से मेरी प्रार्थना है कि छुआछूत के भूत को भूल जाए। ...दूसरी बात यह है कि आपको विदेशी तथा मिलों के वस्त्र को त्याग देना चाहिए और खद्दर पहनना चाहिए। तीसरी बात, सब माताओं को कुछ न कुछ विद्याभ्यास करना चाहिए। चैथी बात यह कि आभूषणों का त्याग करें। माताओं की शोभा आभूषणों से नहीं, हृदय से है। ...हे राष्ट्र की माताओं, हे धर्म की रक्षिकाओं, तुम्हारा कल्याण हो। भगवान हमारी पवित्र भारत भूमि का भला करें।’’ 
2 अगस्त को गांधीजी ने इंग्लिसिया लाइन, चेतगंज, मलदहिया और कबीरचैरा की बस्तियां देखीं। फिर कबीर मठ में गये। वहां की स्वच्छता और सादगी से तथा इस सूचना से उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई कि कबीरपंथियों में अस्पृश्यता नहीं मानी जाती। 
इस प्रकार गांधीजी का देशव्यापी हरिजन प्रवास समाप्त हुआ। इस यात्रा में लगभग 8 लाख रुपए एकत्र हुए। करोड़ों व्यक्तियों तक अस्पृश्यता निवारण का संदेश पहुंचा और देश में अभूतपूर्व जागृति आयी, छुआछूत की भावना कम हुई, सैकड़ों मंदिरों के द्वार हरिजनों के लिए खुल गये और उनकी दुर्दशा की ओर सरकार, स्थानीय सभाओं तथा जनता का ध्यान गया।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

बापू ने कहा था

भाग दो आखिरी
नव भारत के निर्माण में महात्मा गांधी के योगदान को उनके भाषण से समझा जा सकता है। अहिंसा के बल पर उन्होंने जो आन्दोलन चलाया, आगे चलकर उसने पूरे विश्व को एक नई दिशा दी। उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ अपना आन्दोलन चलाया, बल्कि एक स्वस्थ भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दरअसल बापू भारत में पैठ जमा चुके ऊंच-नीच, छुआछूत और जाति, वर्गों में बंट रहे समाज को लेकर भी काफी चिंतित थे। उनके भाषणों से यह साफ दिखता है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, उत्तर प्रदेश ने एक किताब प्रकाशित किया है। इस पुस्तक का नाम है ‘उत्तर प्रदेश में गांधी जी’। इसके लेखक हैं श्रीरामनाथ ‘सुमन’। बापू के भाषणों के अंश यहां इसी पुस्तक से दिए जा रहे हैं। आशा है, पाठक इससे लाभान्वित हो सकेंगे। 
23 नवम्बर, 1920 को महात्मा गांधी ने आगरा के विद्यार्थियों की सभा में भाषण करते हुए कहा - ‘‘...प्रचलित शिक्षा पद्धति हमें कायरता सिखाती है। ...जो तालीम हमारे भय को पुष्ट करती है, वह किस काम की ? जिस शिक्षा में सच्चाई से चलने का अवकाश नहीं, देश-भक्ति का अवकाश नहीं, वह कैसी शिक्षा है ?’’ 
26 नवम्बर, 1920 को काशी में ‘‘...आप जिन परिस्थितियों में पढ़ते हैं, उनमें ऐसी ही शिक्षा मिलती है कि मन में मनुष्य का डर रखना पड़े। परन्तु मैं तो उसे सच्चा एम.ए. कहूंगा जिसने मनुष्य का डर छोड़ कर ईश्वर का डर रखना सीखा हो। ...अंग्रेज इतिहासकार कहते हैं, भारत में तीन करोड़ लोगों को दिन में दो बार पेट भर खाने को नहीं मिलता। बिहार में अधिकांश लोग सत्तू नामक निःसत्व खुराक खाकर रहते हैं। जब भुनी हुई मक्की का यह आटा, पानी और लाल मिर्चों के साथ गले के नीचे उतारते हुए मैंने लोगों को देखा, तो मेरी आंखों से आग बरसने लगी। ...ऐसी स्थिति में आप निश्चिन्त होकर कैसे बैठ सकते हैं? ...यदि हमें आजादी से खाने को न मिले, तो हममें भूखों मरकर आजाद होने की ताकत आनी चाहिए। ...मैं कहता हूं कि यह हुकूमत राक्षसी है, इसलिए उसका त्याग करना हमारा धर्म है। ...शान्तिमय असहयोग करने की ताकत आप में न आये, तो भारत नष्ट हो जायेगा।’’ 
18 अक्तूबर, 1925 को सीतापुर में अस्पृश्यता विरोधी सम्मेलन था। यह सम्मेलन शाम के वक्त हुआ। राजा साहब महेवा इसके अध्यक्ष थे। इसमें गांधीजी ने कहा - ‘‘मैं स्वर्गीय गोखले के इस कथन से पूरी तरह सहमत हूं कि भारतीय अपने कुछ देशवासियों को अस्पृश्य मानकर सारी दुनिया में अस्पृश्य हो गये हैं। ...मेरा निश्चित विश्वास है कि हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है। किसी भी मानव के प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार करना पाप है, इसलिए तथाकथित उच्च जाति के लोगों को अस्पृश्यों के बजाय अपनी ही शु़ि़द्ध करनी चाहिए।’’ 
.... 1931 में जब गांधीजी गोलमेज सम्मेलन में गये थे, तब अल्पसंख्यक जातियों के विशेष प्रतिनिधित्व पर बोलते हुए हरिजनों को अलग प्रतिनिधित्व देकर सदा के लिए उनको हिन्दुओं से अलग कर देने की नीति की जबर्दस्त टीका की और यह भी कह दिया था कि ऐसे किसी प्रयत्न का मैं प्राणों की बाजी लगाकर भी विरोध करूंगा। जेल में भी उन्होंने 11 मार्च, 1933 को भारत सचिव को अपना निश्चय दोहराते हुए सूचना दे दी थी। अगस्त में ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रधानमंत्री श्री रैमजे मैकडानल्ड का निर्णय प्रकाशित हुआ। इसमें वही सब बातें थीं। 18 अगस्त को गांधीजी ने उन्हें लिखा कि निर्णय में परिवर्तन न होने की स्थिति में 21 सितम्बर से मैं आमरण अनशन करूंगा। ठीक समय पर गांधीजी ने अपना आमरण उपवास शुरू किया। इससे बड़ा तहलका मचा। अंत में 26 सितम्बर को उच्चवर्गीय हिन्दू नेताओं एवं अछूतों के नेताओं के बीच एक समझौता हो गया, जिसे सरकार द्वारा भी स्वीकार कर लिया गया और गांधीजी का उपवास समाप्त हुआ। उच्च वर्ण के हिन्दू नेताओं ने अस्पृश्यता निवारण का कलंक दूर करने की जिम्मेदारी ली थी, इसलिए दिल्ली में अस्पृश्ता निवारण संघ (बाद में हरिजन सेवक संघ) की स्थापना की गयी और इस दिशा में काफी काम भी हुआ, किन्तु गांधीजी को ऐसा प्रतित हुआ कि आन्दोलन पूर्ण सच्चाई और पवित्रता के साथ नहीं चल रहा है। सवर्ण हिन्दुओं का दिल जैसा बदलना चाहिए, नहीं बदला है। इससे उन्हें दुख हुआ और इसे अपनी ही आत्मिक अपूर्णता मानकर उन्होंने बिना किसी शर्त के 8 मई, 1933 से 21 दिन का उपवास करने की घोषणा की। पिछले उपवास में 6 दिनों में ही उनकी हालत बड़ी खराब हो गयी थी, इसलिए न सरकार, न जनता को यह आशा थी कि वह 21 दिन का उपवास पूरा कर सकेंगे। सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया, किन्तु छूटने के बाद भी पूना (पर्णकुटी) में रहकर उन्होंने अपना उपवास जारी रखा। प्रभु की कृपा से उपवास पूरा हुआ। 
उनके उपवास से सारे देश का ध्यान उधर ही खिंच गया। 14 जुलाई को सामूहिक सत्याग्रह का आन्दोलन उठा लिया गया। हां, व्यक्तिगत सत्याग्रह की छूट रही। गांधीजी ने साबरमती का सत्याग्रह आश्रम तोड़ दिया और अपना यह निश्चय प्रकट किया कि 1 अगस्त को आश्रम के 32 साथियों के साथ रास स्थान की ओर प्रस्थान करेंगे, जहां किसानों की स्थिति बहुत खराब हो रही थी। 31 जुलाई की रात में उन्हें गिरफ्तार कर पूना के यरवदा जेल में भेज दिया गया। 4 अगस्त को वह इस शर्त के साथ छोड़ दिये गये कि पूना नगर की सीमा के बाहर न जाए, किन्तु गांधीजी ने आज्ञा भंग की और गिरफ्तार कर लिये गये तथा उन्हें एक वर्ष की सादी कैद हुई। 
जेल में हरिजन कार्यों की सुविधा न देने पर गांधीजी ने पुनः उपवास करने का निश्चय किया। बार-बार उपवास से उनका स्वास्थ्य काफी खराब हो गया था। 21 अगस्त को वह सासून अस्पताल ले जाये गये। उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। 23 अगस्त को जब उनकी स्थिति खतरनाक हो गयी, सरकार ने उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया। उन्होंने अस्पताल छोड़ने के पूर्व उपवास तोड़ा और पर्णकुटी में रहने लगे। छूटने पर उन्होंने अपना ध्यान हरिजन कार्य में केन्द्रित करने का इरादा जाहिर किया। 
सितम्बर, 1933 में वह सत्याग्रह आश्रम वर्धा चले गये। वहां 6 सप्ताह तक विश्राम करने के बाद उन्होंने अस्पृश्यता निवारण के लिए संपूर्ण देश का दौरा करने का निश्चय किया। यह दौरा वर्धा से ही 7 नवम्बर, 1933 को शुरू हुआ। 
अप्रैल, 1936 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। जवाहरलाल जी इसके अध्यक्ष थे। इस अवसर पर कुछ पहले से ही चरखा संघ तथा अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ ने मिलकर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया था। 28 मार्च को गांधीजी ने इस प्रदर्शन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर भाषण देते हुए गांधीजी ने कहा - ‘‘ ...इस तरह की प्रदर्शनी के बारे में बरसों से अपने दिल में जो कल्पना मैं रखता आया था, उसको मैं इस प्रदर्शनी में देखता हूं। 1920 में पहली बार हमारा ध्यान गांवों की ओर गया। ...अहमदाबाद की कांग्रेस के साथ जो प्रदर्शनी हुई थी, उसमें मैंने इस विषय में, अपनी कुछ कल्पनाओं को मूर्त रूप देने की चेष्टा की थी। ...मैंने सदा ही कहा है कि हिन्दुस्तान हमारे चंद शहरों से नहीं, सात लाख गांवों से बना है। ...इन देहातों की जो हालत है, उसे मैं खूब जानता हूं। मेरा ख्याल है कि हिन्दुस्तान को घूमकर जितना मैंने देखा है, उतना कांग्रेस के नेताओं में से किसी ने नहीं देखा है। ...हिन्दुस्तान के देहातों को शहरवालों ने इतना चूसा है कि उन बेचारों को अब रोटी का एक टुकड़ा भी समय पर नहीं मिलता। कहीं तो सिर्फ सत्तू खाकर जीते हैं। ...खादी के अलावा दूसरे भी धंधे हैं, जो गांव वालों के जीवन के लिए बहुत आवश्यक और उपयोगी है और जिनसे उनकी हालत, एक बड़ी सीमा तक सुधारी जा सकती है। इसके लिए हमें यह देखना है कि देहातवाले कैसे रहते हैं, क्या काम करते हैं और उनके काम को कैसे तरक्की दी जा सकती है। 
‘‘ ...इस बार की प्रदर्शनी अपने ढंग की पहली प्रदर्शनी है। इसकी रचना के पीछे कल्पना मेरी है। ...इस नुमाइश के जरिये हम दिखाना चाहते हैं कि भूख से बेहाल इस हिन्दुस्तान में भी आज ऐसे हुनर, उद्योग-धंधे और कला-कौशल मौजूद हैं, जिनका हमें कभी ख्याल भी नहीं होता। इस नुमाइश की यही विशेषता है। ...इसे कुछ सीखने की दृष्टि से देखें, तमाशे की दृष्टि से नहीं। जो एक बार इस नुमाइश को देख लेगा, उसे फौरन ही पता चल जाएगा कि हिन्दुस्तान के देहातों में अब भी इतनी ताकत भरी पड़ी है। देहातों की इस ताकत को पहचान कर जो 28 करोड़ देहातियों की सेवा करता है, वही कांग्रेस का सच्चा सेवक है। जो इन करोड़ों की सेवा नहीं करता है, वह कांग्रेस का सरदार या नेता हो सकता है, सेवक या बंदा नहीं बन सकता।’’ गांधीजी लगभग 15 दिन लखनऊ रहे। वह कांग्रेस अधिवेशन में शरीक नहीं हुए।