COPYRIGHT © Rajiv Mani, Journalist, Patna

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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

दालों की नई किस्म ‘पूसा अरहर-16’

नई दिल्ली : केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामले मंत्री अरुण जेटली और केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने दालों की नई किस्म ‘पूसा अरहर-16’ के खेत का मुआयना किया। राधा मोहन सिंह ने इस नई किस्म के बारे में अरुण जेटली को विस्तृत जानकारी दी। श्री जेटली ने ‘पूसा अरहर-16’ को विकसित करने के लिए आईसीएआर के वैज्ञानिकों को बधाई दी और उम्मीद जतायी कि देश जल्द ही दालों के मामले में आत्मनिर्भर बन जाएगा।
इस अवसर पर राधा मोहन सिंह ने कहा कि ‘पूसा अरहर-16’ काफी पहले पक जाने वाली, परिमित, कम ऊंचाई एवं उच्च पैदावार वाली किस्म है और यह किसानों को अगले खरीफ सीजन से उपलब्ध करा दी जाएगी। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि जहां एक ओर परम्परागत किस्मों को पकने में 170 दिन लग जाते हैं, वहीं दूसरी ओर यह नई किस्म सिर्फ 120 दिनों में ही पक जाती है। अरुण जेटली और राधा मोहन सिंह ने बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती (एकता दिवस) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और विशेषकर राष्ट्र के एकीकरण में उनके बहुमूल्य योगदान को स्मरण किया। इस अवसर पर कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग में सचिव शोभना के. पटनायक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन मोहापात्रा के अलावा आईएआरआई की निदेशक डॉ. रविन्दर कौर भी मौजूद थीं।
आईसीएआर-आईएआरआई, नई दिल्ली ने और अधिक जल्दी पकने वाली (120 दिन), कम ऊंचाई वाली (95 सेमी से 120 सेमी तक लंबी) परिमित, अधिक उपज देने वाली नई पादप प्रकार की आनुवंशिक सामग्री अर्थात पूसा अरहर-16 विकसित की है, जो अर्द्ध रूप से सीधा खड़ा होने वाला मजबूत किस्म का पौधा है। अगर इसकी बुआई 30 सेमी की दूरी रखकर और एक पौधे से दूसरे पौधे के मध्य 10 सेमी का अंतर रखकर की जाए, तो एक हेक्टेयर भूमि में इस किस्म की अरहर के 3,30,000 पौधों की सघन आबादी हो सकती है। फसल की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए अधिक घनत्व वाली रोपाई और मशीनीकरण बहुत महत्वपूर्ण है। अरहर की पारंपरिक किस्मों में उच्च घनत्व की रोपाई संभव नहीं होती, क्योंकि उनके पौधे अपरिमित प्रकार के होते हैं और बहुत फैलाव करने वाले होते हैं। इस प्रकार अधिक जनसंख्या घनत्व की उपयुक्तता से पौधों का एक समान घनत्व हो जाता है और जिसके कारण एक समान ही पौधे खड़े होते हैं। इसलिए अंकुर नष्ट होने के कारण होने वाली हानियां कम होती हैं। 
पूसा अरहर 16 के रूप में आईसीएआर-आईएआरआई ने गेहूं और चावल के कम ऊंचाई वाले पौधों की तरह ही अरहर की यह नई किस्म विकसित की है। एनपीटी अरहर के लिए उत्पादकता को खेती की कम लागत के साथ मिश्रित करने के लिए संशोधित कृषि विज्ञान की आवश्यकता है, जिसे विकसित कर लिया गया है। गेहूं की बुवाई से लेकर उसकी कटाई तक प्रयुक्त होने वाली कृषि मशीनरी का एनपीटी अरहर की खेती में पूरी तरह उपयोग किया जा सकता है। पूसा अरहर 16 में पौधों की सघनता और कम ऊंचाई के कारण कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए नैप्सैक स्पेयर का कीट नाशकों के साथ भी प्रभावी रूप से छिड़काव किया जा सकता है। तुल्यकालिक परिपक्वता वाला यह नई किस्म का पौधा मिश्रित खेती के लिए भी उपयुक्त है, इसलिए कटाई और खलिहान कार्य के लिए मानव श्रम की जरूरत नहीं पड़ती। परंपरागत किस्मों की कटाई और खलिहान कार्य के लिए अधिक मानव श्रम और समय की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए खेती की लागत बढ़ने के साथ-साथ बेमौसम की बारिश के कारण फसल को हानि पहुंचने की संभावना रहती है। अरहर की फसल की सफल कटाई के बाद रबी सीजन में सरसों, आलू, गेहूं पैदा किया जा सकता है। इसके अलावा यह किस्म चूंकि जल्दी पकने वाली (120 दिन) है, इसलिए मानसून की शुरुआत (5 जून) से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह तक इसकी बुवाई की जा सकती है।