COPYRIGHT © Rajiv Mani, Journalist, Patna

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रविवार, 27 नवंबर 2016

झारखंड में सूदखोरी व महाजनी प्रथा का अंत

  • सूदखोरी का कारोबार करनेवालों को तीन साल का कारावास और पांच हजार रुपये का अर्थदंड 
  • अपराध की पुनरावृत्ति पर पांच साल का कारावास और दस हजार रुपये का अर्थदंड
  • उधारी या बगैर ब्याज के लेन-देन पर कोई रोक नहीं
 खास खबर 
रांची : मुख्यमंत्री रघुवर दास ने महाजनी प्रथा के विरुद्ध संथाल हूल का बिगुल फूंकने वाले अमर शहीद सिदो - कान्हों और उलगुलान का ऐलान करनेवाले भगवान बिरसा मुंडा को सच्ची श्रद्धांजलि दी है और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के संघर्ष को वास्तविक अर्थों में यथोचित सम्मान दिया है। श्री दास की पहल पर राज्य सरकार ने झारखंड में महाजनी प्रथा, साहूकारी एवं अवैध सूदखोरी व्यवसाय को पूरी तरह बंद करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस प्रावधान को कानून की शक्ल देने की आवश्यक प्रक्रिया पूरी करते हुए मंत्रिपरिषद ने ‘झारखंड निजी साहूकार (निषेध) विधेयक 2016’ को स्वीकृति दे दी है और विधानसभा ने भी इसे पारित कर दिया है। इस कानून के प्रावधानों के अनुसार, अब कोई व्यक्ति किसी वस्तु, संपत्ति, जमीन, स्वर्ण आदि बंधक या रेहन रखकर साहूकारी या सूदखोरी का व्यवसाय नहीं कर सकेगा। यदि कोई व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन कर सूदखोरी या साहूकारी का व्यवसाय करेगा, तो उसे तीन वर्ष तक के कारावास एवं पांच हजार रुपये तक का अर्थदंड दिया जाएगा। यदि किसी व्यक्ति को इस कानून के तहत एक बार सजा हो चुकी है और उसके विरुद्ध दोबारा इस कानून के उल्लंघन का दोष सिद्ध होता है, तो उसे पांच वर्ष तक के कारावास एवं दस हजार रुपये का आर्थिक दंड दिया जाएगा।
विकास आयुक्त सह अपर मुख्य सचिव वित्त एवं योजना अमित खरे ने बताया कि सदियों से झारखंड के भोले भाले ग्रामीण जिनमें सबसे ज्यादा संख्या जनजातीय समुदाय की है, महाजनी प्रथा, साहूकारी एवं सूदखोरी की वजह से शोषण के शिकार हो रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आर्थिक रूप से कमजोर तबके को सूदखोरी और महाजनों के चंगुल से बचाने के लिए कई उपाय किये गए, कई कानून भी बने, लेकिन ये कानून गरीब ग्रामीणों और आदिवासियों को महाजनों के शोषण से पूरी तरह मुक्त कराने में सफल नहीं हो सके। अविभाजित बिहार में ‘बिहार साहूकार अधिनियम 1974’ लागू था, जिसे राज्य विभाजन के बाद झारखंड की सरकार ने भी अंगीकार किया था। लेकिन इस कानून के प्रावधान केवल महाजनों को नियंत्रित करने से ही संबंधित थे।
राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने निजी साहूकारी व्यवस्था का पूरी तरह निषेध करने हेतु प्रस्ताव लाने का निर्देश दिया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर ही झारखंड निजी साहूकार (निषेध) विधेयक 2016 को मंत्रिपरिषद की बैठक में विमर्शोपरांत स्वीकृति मिली और विधानसभा से भी इसे पारित कराया गया।
अमित खरे ने यह भी स्पष्ट किया कि सूदखोरी के खिलाफ बने इस ऐतिहासिक कानून के लागू होने के बावजूद उधारी या बगैर ब्याज के लेन-देन पर कोई रोक नहीं लगी है। इस कानून के माध्यम से केवल किसी व्यक्ति द्वारा किसी उधारी, रेहन या बंधक के विरुद्ध सूद कमाने के कारोबार पर रोक लगाई गई है। उन्होंने कहा कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण, कई निजी बैंकों की स्थापना, सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी विभिन्न बैंकों की शाखाओं की उपस्थिति, जन धन योजना के अंतर्गत बड़ी संख्या में ग्रामीणों का खाता खुलने, भारत सरकार की मुद्रा योजना के अंतर्गत व्यवसाय हेतु सुलभ ढंग से आवश्यकतानुसार ऋण की उपलब्धता तथा बैंकों एवं अन्य अधिकृत वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण की उपलब्धता को देखते हुए अब साहूकारी, महाजनी या सूदखोरी प्रथा के कायम रहने का कोई औचित्य भी नहीं था। अब इनकी उपस्थिति का अर्थ ग्रामीण और खासकर जनजातीय आबादी का शोषण ही था।